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राजपूत काल (7वीं से 11वीं शताब्दी) भारतीय इतिहास का वह समय है जब उत्तर भारत में छोटे-छोटे शक्तिशाली राज्यों का उदय हुआ। इस काल में प्रतिहार, चौहान और चंदेल जैसे वीर राजवंशों ने अपनी वीरता और कला-संस्कृति से भारत को गौरवान्वित किया। इनके शासन में भव्य मंदिरों का निर्माण हुआ और शिक्षा एवं साहित्य को अत्यधिक प्रोत्साहन मिला। हालांकि, आपसी एकता की कमी के कारण अंततः विदेशी आक्रमणकारियों को भारत में प्रवेश का मार्ग मिला।

पाठ का सारांश (चार पंक्तियों में)

​राजपूत काल (7वीं से 12वीं शताब्दी) भारतीय इतिहास का वह युग है जिसमें उत्तर और मध्य भारत में कई छोटे-बड़े क्षेत्रीय राज्यों का उदय हुआ। इस काल में प्रतिहार, चौहान और चंदेल जैसे वीर योद्धा राजवंशों ने विदेशी आक्रमणों का डटकर मुकाबला किया और अपनी वीरता की छाप छोड़ी। शासन व्यवस्था सामंती ढांचे पर आधारित थी, जहाँ राजा सर्वोच्च था लेकिन शक्ति सामंतों में बँटी हुई थी। यह युग अपने भव्य मंदिरों (जैसे खजुराहो), वीरगाथाओं और कला-साहित्य के संरक्षण के लिए स्वर्णिम काल माना जाता है।

1. राजपूतों की उत्पत्ति: एक ऐतिहासिक विमर्श

​हर्षवर्धन की मृत्यु (647 ई.) के बाद भारत की राजनीतिक एकता छिन्न-भिन्न हो गई। इस अराजकता के दौर में उत्तर भारत में जिन नए राजवंशों का उदय हुआ, उन्हें ‘राजपूत’ कहा गया। इनकी उत्पत्ति के विषय में इतिहासकारों में मतभेद हैं:

  • अग्निकुंड का सिद्धांत: चंद्रबरदाई की प्रसिद्ध पुस्तक ‘पृथ्वीराज रासो’ के अनुसार, ऋषि वशिष्ठ ने आबू पर्वत पर एक यज्ञ किया था, जिसकी अग्नि से चार राजपूत वंशों—प्रतिहार, परमार, चालुक्य और चौहान—का जन्म हुआ।
  • विदेशी मूल का सिद्धांत: कर्नल टॉड जैसे पश्चिमी इतिहासकारों का मानना है कि राजपूत शक, कुषाण और हूण जैसी विदेशी जातियों की संतान थे, जिन्होंने बाद में हिंदू धर्म अपना लिया।
  • भारतीय मूल का सिद्धांत: आधुनिक शोधों के अनुसार, राजपूत प्राचीन क्षत्रियों के वंशज थे या वे स्थानीय कबीलों के प्रमुख थे जिन्होंने अपनी शक्ति बढ़ाकर स्वयं को ‘राजपुत्र’ (राजा का पुत्र) घोषित कर दिया।

2. प्रमुख राजपूत राजवंश

प्रतिहार वंश (गुर्जर प्रतिहार)

​यह राजपूत काल का सबसे शक्तिशाली प्रारंभिक वंश था। इन्होंने आठवीं से दसवीं शताब्दी तक उत्तर भारत के एक बड़े हिस्से पर शासन किया।

  • महत्वपूर्ण शासक: नागभट्ट प्रथम इस वंश का संस्थापक था। मिहिर भोज इस वंश का सबसे प्रतापी राजा हुआ, जिसने अपनी राजधानी कन्नौज को बनाया।
  • ऐतिहासिक भूमिका: प्रतिहारों ने लगभग 300 वर्षों तक पश्चिम से होने वाले अरब आक्रमणों को भारत के मुख्य भूभाग में प्रवेश करने से रोके रखा। इन्हें ‘भारत का द्वारपाल’ भी कहा जाता है।

गहड़वाल वंश

​कन्नौज में प्रतिहारों के पतन के बाद चंद्रदेव ने गहड़वाल वंश की स्थापना की।

  • मशहूर शासक: इस वंश का अंतिम शक्तिशाली राजा जयचंद था।
  • अंत: जयचंद और मोहम्मद गोरी के बीच 1194 ई. में चंदावर का युद्ध हुआ, जिसमें जयचंद की पराजय के साथ इस वंश का प्रभाव समाप्त हो गया।

चौहान वंश (अजमेर और दिल्ली)

​चौहान वंश के शासक अपनी अदम्य वीरता के लिए जाने जाते हैं। प्रारंभ में इनका केंद्र अजमेर (सपादलक्ष) था, बाद में इन्होंने दिल्ली पर भी अधिकार कर लिया।

  • पृथ्वीराज चौहान (पृथ्वीराज तृतीय): इस वंश के सबसे प्रसिद्ध राजा थे। उन्होंने तराइन के प्रथम युद्ध (1191 ई.) में मोहम्मद गोरी को करारी शिकस्त दी।
  • पतन: 1192 ई. में तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज की हार हुई, जिसने भारत में तुर्क शासन की नींव रख दी।

चंदेल वंश (जेजाकभुक्ति)

​बुंदेलखंड के क्षेत्र में चंदेलों का शासन था। इनकी राजधानी खजुराहो और महोबा थी।

  • यशोंवर्मन और धंगदेव: इस वंश के महान प्रतापी राजा थे।
  • विशेषता: चंदेल राजा अपनी वीरता से अधिक अपनी वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध हैं। खजुराहो के भव्य मंदिरों का निर्माण इन्हीं के काल में हुआ।

परमार वंश

​परमारों का शासन मालवा (मध्य प्रदेश) के क्षेत्र में था। इनकी राजधानी धारा नगरी थी।

  • राजा भोज: इस वंश के सबसे प्रसिद्ध शासक थे। वे केवल एक महान योद्धा ही नहीं, बल्कि एक उच्च कोटि के विद्वान, कवि और वास्तुशास्त्री भी थे। उन्होंने भोपाल के निकट ‘भोजपुर’ नगर बसाया और सरस्वती मंदिर का निर्माण कराया।

पाल वंश

​बंगाल और बिहार के क्षेत्र में पाल वंश का शासन था।

  • गोपाल: इस वंश का संस्थापक था। धर्मपाल ने विक्रमशिला विश्वविद्यालय की स्थापना की।
  • धर्म: पाल शासक बौद्ध धर्म के महान संरक्षक थे।

3. राजपूत कालीन शासन व्यवस्था

​राजपूत शासन प्रणाली मुख्य रूप से ‘सामंती व्यवस्था’ पर टिकी हुई थी।

  • राजा की स्थिति: राजा राज्य का सर्वोच्च अधिकारी होता था। वह न्याय और प्रशासन का केंद्र था, लेकिन उसकी शक्ति निरंकुश नहीं थी।
  • सामंतवाद: राजा पूरे राज्य को सीधे नहीं संभालता था। वह भूमि को छोटे-बड़े क्षेत्रों (जागीरों) में बाँट देता था, जिसे ‘सामंत’ संभालते थे। ये सामंत युद्ध के समय राजा को सेना और धन की सहायता देते थे।
  • विकेंद्रीकरण: इस व्यवस्था के कारण केंद्रीय सत्ता कमजोर रही, क्योंकि सामंत अक्सर स्वतंत्र होने का प्रयास करते रहते थे।

4. सामाजिक व्यवस्था

​राजपूत काल का समाज वर्ण व्यवस्था और कठोर जाति प्रथा पर आधारित था।

  • राजपूतों का प्रभुत्व: समाज में क्षत्रियों (राजपूतों) का विशेष स्थान था। वीरता, शौर्य और त्याग उनके जीवन के आदर्श थे।
  • स्त्रियों की दशा: समाज में महिलाओं को सम्मान प्राप्त था, लेकिन उनकी स्वतंत्रता सीमित थी। सती प्रथा और जौहर प्रथा (शत्रु के हाथों अपमान से बचने के लिए सामूहिक आत्मदाह) समाज में प्रचलित थी।
  • जाति प्रथा: ब्राह्मणों का स्थान सर्वोच्च था। समाज कई उप-जातियों में विभाजित होने लगा था, जिससे सामाजिक एकता कम हो गई।

5. कला, शिक्षा एवं साहित्य

शिक्षा

​राजपूत राजा विद्वानों के महान संरक्षक थे। इस काल में शिक्षा के प्रमुख केंद्र मंदिर और मठ थे।

  • विश्वविद्यालय: नालंदा और विक्रमशिला के अलावा धारा नगरी (मध्य प्रदेश) और कश्मीर शिक्षा के बड़े केंद्र थे। यहाँ वेद, व्याकरण, तर्कशास्त्र और दर्शन की शिक्षा दी जाती थी।

साहित्य

​संस्कृत और प्राकृत भाषाओं में प्रचुर साहित्य रचा गया।

  • राजशेखर: प्रसिद्ध विद्वान जो प्रतिहार दरबार में थे (काव्यमीमांसा)।
  • जयदेव: ‘गीत गोविंद’ की रचना की।
  • कल्हण: ‘राजतरंगिणी’ लिखी, जो कश्मीर का इतिहास बताती है।
  • पृथ्वीराज रासो: हिंदी भाषा का प्रथम महाकाव्य माना जाता है।

6. मंदिर निर्माण और वास्तुकला

​राजपूत काल मंदिर निर्माण की ‘नागर शैली’ के चरम उत्कर्ष का समय था।

  • खजुराहो के मंदिर: चंदेल राजाओं द्वारा निर्मित ये मंदिर अपनी नक्काशी और सुंदरता के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं (उदा. कंदरिया महादेव मंदिर)।
  • लिंगराज और कोणार्क मंदिर: उड़ीसा में इस काल की भव्य वास्तुकला के दर्शन होते हैं।
  • दिलवाड़ा के जैन मंदिर: आबू पर्वत (राजस्थान) पर स्थित ये मंदिर सफेद संगमरमर की बारीक नक्काशी के लिए अद्भुत हैं।
  • किले: राजपूतों ने सुरक्षा की दृष्टि से विशाल किलों का निर्माण कराया, जैसे चित्तौड़गढ़, ग्वालियर और रणथंभौर के किले।

7. राजपूतों के पतन के कारण

​इतनी वीरता के बावजूद राजपूत विदेशी आक्रमणकारियों के सामने लंबे समय तक टिक नहीं सके। इसके मुख्य कारण थे:

  1. आपसी फूट: राजपूत राजा अक्सर एक-दूसरे से लड़ते रहते थे (जैसे पृथ्वीराज और जयचंद)।
  2. सैन्य कमजोरी: उनकी सेना हाथियों पर निर्भर थी, जबकि तुर्क घोड़ों और धनुर्विद्या में माहिर थे।
  3. सामंती व्यवस्था: एक संगठित केंद्रीय सेना का अभाव था।
राजपूत काल (7वीं-11वीं शताब्दी) – विस्तृत अध्याय एवं इंटरैक्टिव क्विज

🇮🇳 राजपूत काल: शौर्य और संस्कृति का युग 🇮🇳

4 लाइन का सारांश:
राजपूत काल (7वीं-11वीं शताब्दी) भारतीय इतिहास का वह गौरवशाली अध्याय है, जिसमें वीर राजवंशों ने अपनी अद्वितीय बहादुरी और कलात्मक दृष्टिकोण से देश को सींचा। इस युग में प्रतिहार, चौहान, पाल और चंदेल जैसे शासकों ने न केवल विदेशी शत्रुओं से सीमाओं की रक्षा की, बल्कि भव्य मंदिरों और उच्च कोटि के साहित्य का सृजन भी किया। हालांकि आपसी एकता के अभाव में संघर्ष भी हुए, परंतु उनकी सांस्कृतिक और स्थापत्य विरासत आज भी भारत की शान बनी हुई है।

1. राजपूतों की उत्पत्ति: विभिन्न मत और विचारधाराएं 🛡️

सम्राट हर्षवर्धन के साम्राज्य के पतन के बाद, भारतीय क्षितिज पर कई छोटे-बड़े राज्यों का उदय हुआ। इन राज्यों के शासक स्वयं को ‘राजपूत’ कहते थे। इनकी उत्पत्ति भारतीय इतिहास का एक रोचक विषय है।

अग्निकुंड का सिद्धांत: पृथ्वीराज रासो के अनुसार, जब राक्षसी प्रवृत्तियों से धर्म की हानि होने लगी, तब ऋषि वशिष्ठ ने आबू पर्वत पर पवित्र यज्ञ किया। इस यज्ञ की अग्नि से चार वीर योद्धा निकले—प्रतिहार, परमार, चालुक्य और चौहान। इन्हें ही ‘अग्निकुल’ के राजपूत कहा जाता है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: आधुनिक इतिहासकार मानते हैं कि राजपूत प्राचीन क्षत्रियों के वंशज थे। वहीं कुछ का मानना है कि जो विदेशी जातियाँ (जैसे हूण) भारत में आईं और यहीं की संस्कृति अपना ली, उन्हें ही कालांतर में राजपूत कहा जाने लगा। उनके शौर्य और बलिदान ने उन्हें समाज में सर्वोच्च क्षत्रिय स्थान दिलाया।

2. प्रमुख राजवंश: सत्ता और संघर्ष का इतिहास 🚩

प्रतिहार वंश (मालवा एवं कन्नौज)

प्रतिहारों ने उत्तर भारत को लंबे समय तक विदेशी आक्रांताओं से बचाए रखा। इस वंश के महानतम शासक मिहिर भोज थे। उन्होंने कन्नौज को अपनी सत्ता का केंद्र बनाया। उनके शासनकाल में भारत की आर्थिक और सांस्कृतिक समृद्धि चरम पर थी। अरब यात्रियों ने उन्हें ‘बौरह’ कहा और उनके घुड़सवार दस्ते की बहुत प्रशंसा की।

गहड़वाल वंश (कन्नौज)

गहड़वाल वंश की स्थापना चंद्रदेव ने की थी। इन्होंने कन्नौज को एक बार फिर राजनीतिक स्थिरता प्रदान की। इस वंश के प्रसिद्ध राजा जयचंद के समय में कन्नौज अपनी भव्यता के लिए जाना जाता था। वाराणसी इस वंश की दूसरी महत्वपूर्ण राजधानी और धार्मिक केंद्र थी।

चौहान वंश (अजमेर एवं दिल्ली)

शाकंभरी के चौहानों ने अजमेर शहर की स्थापना की और बाद में दिल्ली को भी जीता। इस वंश के नायक पृथ्वीराज चौहान (तृतीय) की वीरता के किस्से आज भी सुने जाते हैं। तराइन के युद्ध भारतीय इतिहास के निर्णायक मोड़ साबित हुए। प्रथम युद्ध (1191) में उनकी विजय ने उनकी धाक जमा दी थी।

चंदेल वंश (जेजाकभुक्ति/बुंदेलखंड)

चंदेल शासक न केवल योद्धा थे, बल्कि महान निर्माता भी थे। राजा परमल के दरबार में आल्हा और ऊदल जैसे महान योद्धा थे, जिनकी वीरता की गाथा ‘आल्हाखंड’ में गाई जाती है। चंदेलों ने खजुराहो में मंदिरों का वह समूह बनवाया जो आज यूनेस्को की विश्व धरोहर है।

पाल वंश (बंगाल)

बंगाल में जब राजनीतिक अस्थिरता फैली, तब जनता ने स्वयं गोपाल को राजा चुना। यह भारतीय लोकतंत्र के शुरुआती उदाहरणों में से एक है। राजा धर्मपाल और देवपाल के समय पाल साम्राज्य का विस्तार बिहार तक हुआ। ये शासक बौद्ध धर्म के महान संरक्षक थे।

3. राजपूत कालीन शासन व्यवस्था और समाज 🏛️

प्रशासनिक ढांचा: राजपूत शासन व्यवस्था विकेंद्रीकृत थी। राजा सर्वोच्च होता था, लेकिन वह सामंतों की सहायता पर निर्भर था। राज्य को भुक्ति, मंडल और ग्रामों में विभाजित किया गया था। शासन में वंशानुगत पद महत्वपूर्ण थे।

सामाजिक संरचना: समाज में वीरता और कुल के प्रति गर्व की भावना कूट-कूट कर भरी थी। राजपूतों में शरणागत की रक्षा करना सबसे बड़ा धर्म माना जाता था। स्त्रियों को समाज में सम्मान प्राप्त था, परंतु जौहर और सती जैसी कठिन प्रथाएं भी प्रचलित थीं।

कला और स्थापत्य: इस काल की कला मुख्य रूप से मंदिरों में दिखाई देती है। ‘नागर शैली’ का विकास इसी काल में हुआ। खजुराहो का कंदरिया महादेव मंदिर, ओडिशा का कोणार्क सूर्य मंदिर और भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर स्थापत्य कला के शिखर हैं।

शिक्षा एवं साहित्य: नालंदा और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों ने इस काल में विश्व भर के छात्रों को आकर्षित किया। संस्कृत के साथ-साथ क्षेत्रीय भाषाओं (जैसे अपभ्रंश) का विकास हुआ। कल्हण की राजतरंगिणी और जयदेव का गीत-गोविंद इसी युग की देन हैं।

4. निष्कर्ष 🇮🇳

राजपूत काल सातवीं से ग्यारहवीं शताब्दी तक भारत की राजनीतिक और सांस्कृतिक धुरी बना रहा। भले ही विदेशी आक्रमणों ने इस युग का अंत कर दिया, लेकिन राजपूतों द्वारा स्थापित किए गए उच्च आदर्श, शौर्य, और स्थापत्य के नमूने आज भी भारत की अटूट पहचान हैं। यह युग हमें सिखाता है कि संस्कृति और वीरता का संगम किसी भी राष्ट्र को अमर बना सकता है।

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यह कंटेंट मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के छात्रों (UP Board), प्रतियोगी परीक्षाओं (UPPSC, UPSSSC, PET) के अभ्यर्थियों और भारतीय इतिहास में रुचि रखने वाले पाठकों को लक्षित करता है।

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