🇮🇳 भारतीय संविधान: धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार 🇮🇳
(अनुच्छेद 25 से 28 तक विस्तृत व्याख्या)
1. प्रस्तावना: धर्मनिरपेक्षता का भारतीय स्वरूप 🕉️ ☪️ ✝️ 🇮🇳
भारतीय संविधान का भाग-3 नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान करता है। इनमें ‘धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार’ (अनुच्छेद 25-28) भारत के धर्मनिरपेक्ष (Secular) ढांचे की रीढ़ है। 42वें संविधान संशोधन 1976 द्वारा प्रस्तावना में ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द जोड़ा गया, जिसका अर्थ है कि राज्य का अपना कोई धर्म नहीं होगा और वह सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार करेगा।
2. अनुच्छेद 25: अंतःकरण की और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता
यह अनुच्छेद व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है। इसके चार मुख्य घटक हैं:
- अंतःकरण की स्वतंत्रता: व्यक्ति को भगवान या अपने गुरु के साथ अपने संबंधों को अपने तरीके से ढालने की आंतरिक स्वतंत्रता है।
- मानने का अधिकार: अपनी धार्मिक आस्था की सार्वजनिक और बिना भय के घोषणा करना।
- आचरण का अधिकार: धार्मिक पूजा, परंपरा और समारोह करने की आजादी। (जैसे सिखों द्वारा कृपाण धारण करना)।
- प्रचार का अधिकार: अपने धार्मिक सिद्धांतों का प्रसार करना। नोट: इसमें किसी का जबरन धर्मांतरण कराने का अधिकार शामिल नहीं है।
सीमाएँ: यह अधिकार पूर्ण नहीं है। सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order), नैतिकता (Morality) और स्वास्थ्य (Health) के आधार पर राज्य इस पर प्रतिबंध लगा सकता है।
3. अनुच्छेद 26: धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता 🏰
अनुच्छेद 25 जहाँ व्यक्तिगत अधिकारों की बात करता है, वहीं अनुच्छेद 26 ‘धार्मिक संप्रदायों’ (Groups) को अधिकार देता है:
- धार्मिक और परोपकारी संस्थाओं की स्थापना और पोषण का अधिकार।
- अपने धर्म विषयक कार्यों का प्रबंध करने का अधिकार।
- चल और अचल संपत्ति के अर्जन और स्वामित्व का अधिकार।
- ऐसी संपत्ति का विधि के अनुसार प्रशासन करने का अधिकार।
4. अनुच्छेद 27: धर्म की अभिवृद्धि के लिए करों के संदाय से स्वतंत्रता 💸
यह अनुच्छेद घोषित करता है कि किसी भी व्यक्ति को ऐसा ‘कर’ (Tax) देने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा, जिसका उपयोग किसी विशिष्ट धर्म या धार्मिक संप्रदाय की उन्नति के लिए किया जाना हो। यह राज्य को किसी एक धर्म का पक्ष लेने से रोकता है। हालांकि, ‘शुल्क’ (Fee) लिया जा सकता है ताकि तीर्थयात्रियों को सेवाएं दी जा सकें।
5. अनुच्छेद 28: धार्मिक शिक्षा में उपस्थित होने से स्वतंत्रता 🏫
यह शिक्षण संस्थानों में धार्मिक निर्देशों के संबंध में है:
- पूर्णतः राज्य द्वारा वित्तपोषित संस्थान: यहाँ कोई धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी।
- राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त या सहायता प्राप्त संस्थान: यहाँ धार्मिक शिक्षा दी जा सकती है, लेकिन किसी भी छात्र को उसमें भाग लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता (अभिभावक की सहमति अनिवार्य)।
(यहाँ 1500 शब्दों की पूर्ण व्याख्या का संक्षिप्त सार है… शैक्षणिक प्रयोजन हेतु विस्तार जारी रहता है…)
प्रश्न यहाँ दिखेगा…
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