संस्कृत व्याकरण में संज्ञा और सर्वनाम के भेदों को समझना भाषा की नींव रखने जैसा है।
शब्द-भेद (Parts of Speech) को तीनों भाषाओं—अंग्रेजी, हिंदी और संस्कृत—में एक तुलनात्मक तालिका (Excel Style) के रूप में तैयार किया है।
संस्कृत में इन्हें मुख्य रूप से ‘सुबन्त’ (संज्ञा/सर्वनाम), ‘तिङन्त’ (क्रिया) और ‘अव्यय’ की श्रेणियों में रखा जाता है।
शब्द-भेद तालिका (Parts of Speech Table)
| क्रम | English (Parts of Speech) | हिंदी (शब्द-भेद) | संस्कृत (पर्याय) |
|---|---|---|---|
| 1 | Noun | संज्ञा | नाम / संज्ञा |
| 2 | Pronoun | सर्वनाम | सर्वनाम (सर्वादि) |
| 3 | Adjective | विशेषण | विशेषणम् |
| 4 | Verb | क्रिया | क्रिया / धातुः |
| 5 | Adverb | क्रिया-विशेषण | क्रियाविशेषणम् (अव्यय) |
| 6 | Preposition | सम्बन्धबोधक | सम्बन्धवाचक अव्यय |
| 7 | Conjunction | समुच्चयबोधक | समुच्चयबोधक / योजकः |
| 8 | Interjection | विस्मयादिबोधक | विस्मयादिबोधक अव्यय |
कुछ महत्वपूर्ण जानकारी:
- विकारी और अविकारी: हिंदी और संस्कृत दोनों में पहले चार (संज्ञा से क्रिया तक) विकारी कहलाते हैं क्योंकि इनके रूप बदलते हैं। अंतिम चार अविकारी या अव्यय कहलाते हैं क्योंकि इनके रूप कभी नहीं बदलते।
- संस्कृत की विशेषता: संस्कृत में क्रिया को ‘धातु’ कहा जाता है और संज्ञा/सर्वनाम के रूपों को ‘विभक्ति’ के आधार पर चलाया जाता है।
- अव्यय: अंग्रेजी के Preposition, Conjunction और Interjection को संस्कृत में सामूहिक रूप से ‘अव्यय’ (Indeclinables) कहा जाता है।
संस्कृत में इनके मुख्य भेद निम्नलिखित हैं:
1. संज्ञा (Noun) के भेद
संस्कृत व्याकरण (विशेषकर पाणिनीय पद्धति) में संज्ञा के मुख्य रूप से तीन भेद माने जाते हैं:
भाववाचक संज्ञा: जो गुण, दशा या धर्म का बोध कराए। (जैसे: मधुरता, विद्वत्ता)
व्यक्तिवाचक संज्ञा: किसी विशेष व्यक्ति, स्थान या वस्तु का नाम। (जैसे: रामः, हिमालयः)
जातिवाचक संज्ञा: जो पूरी जाति या समूह का बोध कराए। (जैसे: बालकः, नदी, पर्वत:)
2. सर्वनाम (Pronoun) के भेद
संस्कृत में सर्वनामों की संख्या काफी अधिक है। ‘सर्वादीनि सर्वनामानि’ सूत्र के अनुसार कुल 35 सर्वनाम शब्द गिनाए गए हैं। लेकिन यदि हम इनके प्रकारों (Categories) की बात करें, तो इन्हें मुख्य रूप से छह भागों में बाँटा जा सकता है:
| क्रम | सर्वनाम के भेद | उदाहरण (संस्कृत में) |
|---|---|---|
| 1 | पुरुषवाचक | अहम् (मैं), त्वम् (तुम), सः (वह) |
| 2 | निश्चयवाचक | एतत् (यह), तत् (वह – निश्चित दूर के लिए) |
| 3 | अनिश्चयवाचक | कश्चित् (कोई), किमपि (कुछ) |
| 4 | सम्बन्धवाचक | यः-सः (जो-सो), यथा-तथा |
| 5 | प्रश्नवाचक | कः (कौन), किम् (क्या) |
| 6 | निजवाचक | स्वयम्, आत्मन् |
विशेष ध्यान देने योग्य बात
संस्कृत व्याकरण में सर्वनामों को ‘सर्वादि गण’ कहा जाता है। इसमें ‘सर्व’ (सब), ‘विश्व’ (संसार/सब), ‘यद्’ (जो), ‘तद्’ (वह), ‘युष्मद्’ (तुम) और ‘अस्मद्’ (मैं) जैसे शब्द सबसे महत्वपूर्ण हैं।
1. विशेषण (Adjective) के भेदविशेषण वह शब्द है जो संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता (गुण, संख्या आदि) बताए। संस्कृत में इसके मुख्य चार भेद माने जाते हैं:गुणवाचक विशेषण: जो संज्ञा के गुण, दोष, रंग या आकार को बताए। (जैसे: नीलम् कमलम्, चतुरः बालकः)संख्यावाचक विशेषण: जो वस्तु की संख्या का बोध कराए। (जैसे: एकः पुरुषः, पञ्च फलानि)परिमाणवाचक विशेषण: जो नाप-तौल या मात्रा का बोध कराए। (जैसे: अल्पम् जलम्, बहु दुग्धम्)संकेतवाचक (सार्वनामिक) विशेषण: जब कोई सर्वनाम शब्द संज्ञा की विशेषता बताने के लिए प्रयोग हो। (जैसे: सः बालकः, एषा कन्या)
2. क्रिया (Verb / धातु) के भेद
संस्कृत में क्रिया को ‘धातु’ कहा जाता है। इसे मुख्य रूप से तीन आधारों पर वर्गीकृत किया गया है:
(A) कर्म के आधार पर:
- सकर्मक क्रिया: जिसमें कर्म (Object) की अपेक्षा होती है। (जैसे: पठति – क्या पढ़ता है? पुस्तकम्)
- अकर्मक क्रिया: जिसमें कर्म की आवश्यकता नहीं होती। (जैसे: हसति, शेते – वह सोता है)
(B) पदों के आधार पर (Atmanepada vs Parasmaipada):
- परस्मैपदी: जिनका फल दूसरे पर पड़ता है। (जैसे: पठति, गच्छति)
- आत्मनेपदी: जिनका फल स्वयं कर्ता पर पड़ता है। (जैसे: लभते, सेवते)
- उभयपदी: जो दोनों रूपों में चलती हैं। (जैसे: करोति/कुरुते)
(C) काल और अवस्था (लकार):
मुख्य रूप से क्रिया के 10 लकार होते हैं (जैसे लट्, लृट्, लङ्, विधिलिङ् आदि), जो वर्तमान, भविष्य और भूतकाल का बोध कराते हैं।
3. क्रिया विशेषण (Adverb) के भेद
संस्कृत में क्रिया विशेषण को ‘अव्यय’ का एक हिस्सा माना जाता है। “क्रियायाः विशेषणं क्रियाविशेषणम्” – जो क्रिया की विशेषता बताए। इसके मुख्य चार भेद हैं:
| भेद | विवरण | उदाहरण |
|---|---|---|
| स्थानवाचक | जो क्रिया के स्थान का बोध कराए। | अत्र (यहाँ), तत्र (वहाँ), सर्वत्र (सब जगह) |
| कालवाचक | जो क्रिया के समय का बोध कराए। | अधुना (अब), श्वः (कल), सदा (हमेशा) |
| रीतिवाचक | जो क्रिया के होने का तरीका बताए। | शनैः (धीरे), उच्चैः (ज़ोर से), सहसा (अचानक) |
| परिमाणवाचक | जो क्रिया की मात्रा का बोध कराए। | ईषत् (थोड़ा), बहु (बहुत), पर्याप्तम् |
एक महत्वपूर्ण नियम: संस्कृत में विशेषण हमेशा उसी विभक्ति, वचन और लिंग में होता है जिसमें उसका ‘विशेष्य’ (संज्ञा/सर्वनाम) होता है।
संस्कृत और हिंदी व्याकरण के अनुसार इन तीनों को ‘अव्यय’ (Indeclinables) की श्रेणी में रखा जाता है। MASTERKEY
1. Preposition (प्रपोजिशन)
इसे हिंदी में ‘सम्बन्धबोधक अव्यय’ कहते हैं।
- परिभाषा: जो शब्द संज्ञा या सर्वनाम के बाद आकर उसका सम्बन्ध वाक्य के अन्य शब्दों से बताते हैं।
- उदाहरण: ‘के ऊपर’ (Up), ‘के नीचे’ (Down), ‘के बिना’ (Without)।
- वाक्य: बिल्ली मेज के नीचे है। (मन्जरः उत्पीठिकायाः अधः अस्ति।)
2. Conjunction (कंजक्शन)
इसे हिंदी में ‘समुच्चयबोधक अव्यय’ या साधारण भाषा में ‘योजक’ कहते हैं।
- परिभाषा: जो दो शब्दों, वाक्यांशों या वाक्यों को जोड़ने का कार्य करते हैं।
- उदाहरण: ‘और’ (And), ‘किन्तु’ (But), ‘अथवा’ (Or), ‘च’ (संस्कृत में ‘और’)।
- वाक्य: राम और श्याम पढ़ रहे हैं। (रामः श्यामः च पठतः।)
3. Interjection (इंटर्जेक्शन)
इसे हिंदी में ‘विस्मयादिबोधक अव्यय’ कहते हैं।
- परिभाषा: जो शब्द हर्ष, शोक, आश्चर्य, घृणा आदि मन के भावों को अचानक प्रकट करते हैं।
- उदाहरण: ‘अरे!’ (Hey!), ‘वाह!’ (Wow!), ‘हाय!’ (Alas!)।
- वाक्य: अरे! तुम यहाँ कैसे? (अये! भवान् अत्र कथम्?)
एक नज़र में तुलना
| अंग्रेजी नाम | हिंदी नाम | संस्कृत पर्याय |
|---|---|---|
| Preposition | सम्बन्धबोधक | सम्बन्धवाचक अव्यय |
| Conjunction | समुच्चयबोधक | योजक / च-कार |
| Interjection | विस्मयादिबोधक | विस्मयादिबोधक अव्यय |
इन तीनों को संस्कृत में ‘अव्यय’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनके रूप लिंग, वचन या कारक के अनुसार कभी नहीं बदलते (सदृशं त्रिषु लिङ्गेषु…)।
अर्थ के आधार पर सम्बन्धबोधक के 14 भेद:
- कालवाचक (Time): जो समय का बोध कराते हैं।
- उदाहरण: आगे, पीछे, पूर्व, पहले, पश्चात, उपरांत।
- स्थानवाचक (Place): जो स्थान या जगह का बोध कराते हैं।
- उदाहरण: ऊपर, नीचे, बाहर, भीतर, पास, निकट, बीच।
- दिशावाचक (Direction): जो दिशा की ओर संकेत करते हैं।
- उदाहरण: ओर, तरफ, आर-पार, आसपास।
- साधनवाचक (Instrument): जो किसी माध्यम या साधन को दर्शाते हैं।
- उदाहरण: द्वारा, माध्यम, सहारे, जरिए, हाथ।
- हेतुवाचक/कारणवाचक (Reason): जो उद्देश्य या कारण बताते हैं।
- उदाहरण: लिए, वास्ते, हेतु, कारण, खातिर।
- विषयवाचक (Subject): जो किसी विषय के बारे में बताते हैं।
- उदाहरण: बाबत, नाम, विषय, भरोसे।
- व्यतिरेकवाचक (Exclusion): जो अलगाव या कमी दर्शाते हैं।
- उदाहरण: सिवा, अलावा, बिना, अतिरिक्त, रहित।
- विनिमयवाचक (Exchange): जो बदले या स्थान लेने का बोध कराते हैं।
- उदाहरण: बदले, जगह, एवज।
- सादृश्यवाचक (Similarity): जो समानता दर्शाते हैं।
- उदाहरण: समान, तरह, भांति, योग्य, जैसा, अनुरूप।
- विरोधवाचक (Opposition): जो प्रतिकूलता या विरोध दर्शाते हैं।
- उदाहरण: विरुद्ध, खिलाफ, विपरीत, उलटे।
- सहचरवाचक (Association): जो साथ होने का बोध कराते हैं।
- उदाहरण: संग, साथ, सहित, समेत।
- तुलनावाचक (Comparison): जो दो के बीच तुलना करते हैं।
- लक्ष्यवाचक (Target): जो किसी लक्ष्य की ओर संकेत करें।
- उदाहरण: मात्र, भर, तक।
- संग्रहवाचक (Collection): जो सीमा या संग्रहण का बोध कराएं।
उदाहरण: पर्यन्त, भर, तक।
2. समुच्चयबोधक अव्यय (Conjunction) के भेद
समुच्चयबोधक अव्यय के मुख्य रूप से दो भेद होते हैं:
- समानाधिकरण समुच्चयबोधक: जो समान स्तर के शब्दों या वाक्यों को जोड़ते हैं। इसके 4 उपभेद हैं:
- संयोजक: और, व, एवं।
- विभाजक: या, अथवा, वा।
- विरोधदर्शक: पर, परन्तु, किन्तु, मगर।
- परिणामदर्शक: इसलिए, अतः, फलतः।
- व्यधिकरण समुच्चयबोधक: जो एक मुख्य वाक्य में एक या अधिक आश्रित उपवाक्यों को जोड़ते हैं। इसके भी 4 उपभेद हैं:
- कारणवाचक: क्योंकि, जो कि, चूँकि।
- संकेतवाचक: यदि-तो, यद्यपि-तथापि।
- स्वरूपवाचक: यानी, मानो, अर्थात।
- उद्देश्यवाचक: ताकि, जिससे कि।
3. विस्मयादिबोधक अव्यय (Interjection) के भेद
चूँकि ये मन के भावों को प्रकट करते हैं, इसलिए इनके सात प्रमुख भेद माने जाते हैं:
- हर्षबोधक: अहा!, वाह!, धन्य!, शाबाश!
- शोकबोधक (पीड़ा): हाय!, आह!, ऊह!, त्राहि-त्राहि!
- आश्चर्यबोधक: क्या!, ओहो!, हैं!, अहा!
- तिरस्कारबोधक (घृणा): छिः!, धिक्!, हट!, धत्!
- स्वीकारबोधक: हाँ!, जी हाँ!, अच्छा!, ठीक!
- सम्बोधनबोधक: हे!, अजी!, ओ!, अरे!
- भयबोधक: बाप रे बाप!, ओ माँ!
संक्षिप्त तालिका (Quick Reference)
| अव्यय का नाम | मुख्य भेदों की संख्या | उदाहरण |
|---|---|---|
| सम्बन्धबोधक | 14 (प्रयोगानुसार) | के बिना, के ऊपर, की ओर |
| समुच्चयबोधक | 2 (मुख्य) | और, परन्तु, इसलिए, क्योंकि |
| विस्मयादिबोधक | 7 (भावानुसार) | वाह!, छिः!, अरे!, हाय! |
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