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परंपरागत हिंदू समाज की वर्ण व्यवस्था के अनुसार, शिक्षा का अधिकार केवल ‘द्विज’ वर्गों (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) तक सीमित था।

  • शूद्र और अति-शूद्र (दलित): इन्हें वेदों के श्रवण और विद्या प्राप्ति से पूरी तरह वंचित रखा गया था।
  • महिलाएँ: भले ही वे किसी भी वर्ण की हों, समय के साथ उनके लिए भी औपचारिक शिक्षा के द्वार लगभग बंद कर दिए गए थे।

​२. समाज में इन लोगों की दुर्गति

​शिक्षा के अभाव में इन वर्गों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी:

  • सामाजिक बहिष्कार: इन्हें बस्तियों से दूर रहने पर मजबूर किया जाता था।
  • अमानवीय प्रथाएँ: गले में हांडी (थूकने के लिए) और कमर में झाड़ू (पैरों के निशान मिटाने के लिए) बांधने जैसी कुप्रथाएं थोपी गई थीं।
  • आर्थिक गुलामी: बिना शिक्षा के वे केवल मैला ढोने, मरे हुए पशु उठाने या बंधुआ मजदूरी करने के लिए विवश थे।
  • मानसिक दासता: उन्हें विश्वास दिलाया गया था कि उनकी यह स्थिति उनके पिछले जन्मों के कर्मों का फल है।

​३. अत्याचार करने वाले लोग

​इन लोगों पर मुख्य रूप से उच्च वर्ग (सवर्ण) के लोग अत्याचार करते थे।

  • धर्मशास्त्रों का डर: धर्म के ठेकेदारों ने ऐसे नियम बनाए थे कि यदि कोई शूद्र वेद मंत्र सुन भी ले, तो उसके कानों में पिघला हुआ सीसा डालने जैसे कठोर दंड का प्रावधान था।
  • सामंती व्यवस्था: जमींदारों और वर्चस्ववादी समूहों ने इन्हें केवल सस्ते श्रम के स्रोत के रूप में देखा और इनका शोषण किया।

​४. स्थिति में सुधार कैसे हुआ?

​ज्ञान के इस अंधेरे को दूर करने में कई समाज सुधारकों और आंदोलनों का हाथ रहा:

कारक/व्यक्तित्वसुधार में योगदान
महात्मा जोतिराव फुले१८४८ में पुणे में अछूतों और लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला।
सावित्रीबाई फुलेभारत की पहली महिला शिक्षिका बनकर महिलाओं और दलितों को शिक्षित किया।
डॉ. बी. आर. अंबेडकर“शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो” का नारा दिया और संविधान के माध्यम से समान अधिकार दिलाए।
ब्रिटिश शिक्षा नीतिहालांकि उनके अपने स्वार्थ थे, लेकिन उन्होंने शिक्षा को सबके लिए खोल दिया।
भारतीय संविधानअनुच्छेद १५, १६ और १७ के तहत छुआछूत को समाप्त किया और शिक्षा को मौलिक अधिकार की ओर मोड़ा।

१. महात्मा जोतिराव फुले: “विद्या बिना मति गई”

​फुले जी का मानना था कि शिक्षा ही वह एकमात्र हथियार है जिससे सामाजिक असमानता को खत्म किया जा सकता है। उन्होंने शिक्षा के महत्व को इन पंक्तियों में समझाया था:

“विद्या बिना मति गई, मति बिना नीति गई, नीति बिना गति गई, गति बिना वित्त गया, वित्त बिना शूद्र खिसके, इतने अनर्थ एक अविद्या ने किए!”

  • प्रथम विद्यालय (1848): उन्होंने पुणे के भिड़े वाडा में लड़कियों के लिए भारत का पहला स्कूल खोला। उस समय अछूतों और महिलाओं को पढ़ाना “पाप” माना जाता था।
  • सावित्रीबाई फुले का योगदान: उन्होंने अपनी पत्नी सावित्रीबाई को पहले स्वयं शिक्षित किया और फिर उन्हें शिक्षिका बनाया। जब सावित्रीबाई स्कूल जाती थीं, तो लोग उन पर गंदगी और पत्थर फेंकते थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
  • सत्यशोधक समाज: इसके माध्यम से उन्होंने पिछड़ी जातियों में यह चेतना जगाई कि वे बिना किसी पुरोहित या बिचौलिए के भी शिक्षित और समृद्ध हो सकते हैं।

​२. डॉ. बी.आर. अंबेडकर: “शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो”

​अंबेडकर का संघर्ष फुले जी के संघर्ष का ही अगला और अधिक व्यापक चरण था। उन्होंने शिक्षा को ‘शेरनी का दूध’ कहा था।

  • व्यक्तिगत अपमान से संघर्ष: बचपन में उन्हें क्लास के बाहर बैठना पड़ता था और उन्हें मटके से पानी पीने की भी अनुमति नहीं थी। इन अपमानों ने उन्हें संकल्प दिया कि वे शिक्षा के माध्यम से इस व्यवस्था को बदल देंगे।
  • उच्च शिक्षा का कीर्तिमान: वे कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से डॉक्टर ऑफ साइंस (D.Sc.) जैसी डिग्रियां लेने वाले पहले भारतीय दलित बने, जो उस समय एक चमत्कार जैसा था।
  • पीपुल्स एजुकेशन सोसाइटी: उन्होंने ‘सिद्धार्थ कॉलेज’ और ‘मिलिंद कॉलेज’ की स्थापना की ताकि गरीब और दलित छात्र सस्ती और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त कर सकें।
  • संवैधानिक सुरक्षा: संविधान निर्माता के रूप में उन्होंने सुनिश्चित किया कि शिक्षा केवल कुछ लोगों का विशेषाधिकार न रहकर हर नागरिक का मौलिक अधिकार बने।

​इन दोनों के बीच का संबंध

​डॉ. अंबेडकर महात्मा फुले को अपना ‘तीसरा गुरु’ मानते थे (बुद्ध और कबीर के बाद)। फुले ने जहाँ शिक्षा के बंद दरवाजे ‘खोले’, वहीं अंबेडकर ने उन दरवाजों से होकर पूरे समाज को ‘सत्ता और सम्मान’ के गलियारों तक पहुँचाया।

ज्ञान और सत्ता का अंतर्संबंध

ज्ञान केवल जानकारी नहीं, बल्कि ‘शक्ति’ (Power) का स्रोत है। इतिहास गवाह है कि जब भी किसी समूह ने समाज पर अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहा, उसने सबसे पहले शिक्षा और ज्ञान पर पहरा बिठाया। ‘ज्ञान का निषेध’ वह प्रक्रिया है जिसके तहत समाज के एक बड़े वर्ग को पढ़ने, लिखने और वैचारिक उन्नति करने से वंचित कर दिया गया।

१. प्राचीन भारत में वर्ण व्यवस्था और निषेध

भारतीय समाज के संदर्भ में, मनुस्मृति जैसे ग्रंथों ने ज्ञान को वर्णों के आधार पर विभाजित किया। ‘शूद्रों’ और ‘अति-शूद्रों’ के लिए वेदों का श्रवण भी अपराध घोषित कर दिया गया। ऐसा इसलिए किया गया ताकि ये वर्ग कभी अपने अधिकारों के प्रति जागरूक न हो सकें और सत्ता की संरचना को चुनौती न दे सकें।

२. महिलाओं पर ज्ञान का प्रतिबंध

न केवल जाति, बल्कि ‘लिंग’ के आधार पर भी ज्ञान का निषेध किया गया। मध्यकाल तक आते-आते महिलाओं को घर की चारदीवारी तक सीमित कर दिया गया। उन्हें “अज्ञानता” का पर्याय माना गया ताकि वे पुरुष-प्रधान समाज के अधीन बनी रहें।

३. दुर्गति और मानवाधिकारों का हनन

जिन लोगों पर ज्ञान का निषेध थोपा गया, उनकी स्थिति पशुवत हो गई। वे आर्थिक रूप से केवल मैला ढोने या बंधुआ मजदूरी करने तक सीमित रह गए। मानसिक रूप से उन्हें यह विश्वास दिला दिया गया कि वे “अछूत” और “अपवित्र” हैं। यह मानवता के इतिहास का सबसे काला अध्याय था।

४. आधुनिक भारत और प्रतिरोध की मशाल

१९वीं शताब्दी में महात्मा जोतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले ने इस निषेध को तोड़ा। उन्होंने पुणे में पहला स्कूल खोलकर यह सिद्ध किया कि ज्ञान किसी की बपौती नहीं है। बाद में डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने ‘शिक्षा’ को दलितों की मुक्ति का मुख्य स्तंभ बनाया। उन्होंने कहा था कि “शिक्षा वह शेरनी का दूध है जो पियेगा वह दहाड़ेगा।”

ज्ञान का निषेध – महा क्विज

🇮🇳 ज्ञान का निषेध: ऐतिहासिक क्विज 🎓

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