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देवदासी प्रथा भारतीय इतिहास का एक ऐसा काला अध्याय है, जिसने धर्म की आड़ में बहुजनों की बेटियों के जीवन को अंधकार में धकेल दिया। यह केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं थी, बल्कि यह सामाजिक, आर्थिक और लैंगिक शोषण का एक संस्थागत ढांचा था।

देवदासी प्रथा में शोषण की शुरुआत लड़की के जन्म के कुछ समय बाद या किशोरावस्था से ही हो जाती थी। अक्सर गरीब बहुजन परिवारों की लड़कियों को ‘भगवान की सेवा’ के नाम पर मंदिर को दान कर दिया जाता था।
​धार्मिक भय: माता-पिता को यह विश्वास दिलाया जाता था कि यदि वे अपनी बेटी को मंदिर को नहीं सौंपेंगे, तो देवता क्रोधित हो जाएंगे।
​अधिकारों का अंत: एक बार ‘पोट्टू कट्टू’ (विवाह की रस्म) हो जाने के बाद, उस लड़की का अपने परिवार पर कोई अधिकार नहीं रहता था। वह कानूनी रूप से किसी पुरुष से विवाह नहीं कर सकती थी।
​2. ‘कन्नी कलयाणम’: कौमार्य की नीलामी
​शोषण का सबसे वीभत्स रूप वह रस्म थी जिसे ‘कन्नी कलयाणम’ कहा जाता था। जब लड़की अपनी किशोरावस्था (Puberty) में पहुँचती थी, तो उसके कौमार्य की सार्वजनिक रूप से नीलामी जैसी स्थिति होती थी।
​उच्च वर्ग का नियंत्रण: स्थानीय जमींदार, राजा या मंदिर के शक्तिशाली पुरोहित उस लड़की के साथ पहली रात बिताने का अधिकार ‘खरीदते’ थे। इसके बदले में मंदिर या परिवार को कुछ धन दिया जाता था।
​बचपन का अंत: 10 से 12 वर्ष की बच्चियों को शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार किए बिना इस यौन शोषण के चक्र में धकेल दिया जाता था।
​3. धार्मिक आड़ में यौन दासता
​देवदासी का शाब्दिक अर्थ है “ईश्वर की दासी”, लेकिन व्यवहार में वे मंदिर के रक्षकों और प्रभावशाली पुरुषों की ‘यौन दासी’ बनकर रह गईं।
​संस्थागत वेश्यावृत्ति: धर्म के नाम पर इसे पवित्र माना गया, जिससे समाज ने इस शोषण पर कभी सवाल नहीं उठाया। लड़कियों को सिखाया जाता था कि पुरुषों की सेवा करना ही ईश्वर की सेवा है।
​अदृश्य शोषण: उन्हें मंदिरों के भीतर बने विशेष कक्षों में रहना पड़ता था, जहाँ उनकी मर्जी के बिना शक्तिशाली पुरुष उनका शोषण करते थे।
​4. आर्थिक और सामाजिक बहिष्कार
​इन लड़कियों के पास आजीविका का कोई स्वतंत्र साधन नहीं था।
​संपत्ति पर अधिकार का अभाव: हालांकि कुछ क्षेत्रों में देवदासियों को भूमि दी गई थी, लेकिन उसका नियंत्रण अंततः मंदिर प्रशासन के पास ही होता था।
​बहुजन समाज पर बोझ: यह प्रथा मुख्य रूप से दलित और पिछड़े वर्गों (बहुजनों) पर थोपी गई थी। उच्च जातियों ने अपनी बेटियों को कभी इस प्रथा में नहीं भेजा, बल्कि बहुजन बेटियों का उपयोग अपनी वासना पूर्ति के लिए किया।
​5. संतानों का भविष्य और कलंक
​यदि किसी देवदासी को बच्चा होता था, तो समाज उसे ‘अवैध’ मानता था।
​वंशवाद का चक्र: देवदासियों की बेटियों को अक्सर मजबूरी में फिर से देवदासी ही बनना पड़ता था क्योंकि समाज उन्हें स्वीकार नहीं करता था।
​पहचान का संकट: इन बच्चों के पास पिता का नाम नहीं होता था, जिससे उन्हें शिक्षा और रोजगार में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था।
​6. स्वास्थ्य और बीमारियां
​लगातार यौन शोषण और जागरूकता की कमी के कारण, ये लड़कियां कम उम्र में ही गंभीर बीमारियों का शिकार हो जाती थीं।
​यौन संचारित रोग (STDs): बिना किसी सुरक्षा या चिकित्सा सहायता के, कई लड़कियां सिफलिस और बाद के दौर में एड्स जैसी बीमारियों की चपेट में आ गईं।
​कुपोषण: मंदिर के बचे-खुचे भोजन पर निर्भर रहने के कारण उनका शारीरिक विकास भी बाधित होता था।
​7. सुधार आंदोलन और मुक्ति का संघर्ष
​इस प्रथा के खिलाफ डॉ. बी.आर. अंबेडकर, पेरियार ई.वी. रामास्वामी और मुथुलक्ष्मी रेड्डी जैसे समाज सुधारकों ने आवाज उठाई।
​बहुजन चेतना: अंबेडकर जी ने कहा था कि यदि यह प्रथा इतनी ही पवित्र है, तो उच्च जाति के लोग अपनी बेटियों को देवदासी क्यों नहीं बनाते? उन्होंने बहुजन समाज को इस मानसिक गुलामी से बाहर निकलने का आह्वान किया।
​कानूनी प्रतिबंध: लंबे संघर्ष के बाद, 1947 में मद्रास देवदासी अधिनियम और बाद में अन्य राज्यों में इसे प्रतिबंधित किया गया।
​निष्कर्ष
​देवदासी प्रथा बहुजन समाज के खिलाफ एक सोची-समझी साजिश थी, जिसने हजारों लड़कियों के बचपन और गरिमा को छीन लिया। यह धर्म, जाति और पितृसत्ता का एक ऐसा घातक मिश्रण था जिसने शोषण को ‘पवित्र’ बना दिया। आज भले ही यह कानूनी रूप से समाप्त है, लेकिन इसके सामाजिक और मानसिक निशान आज भी मौजूद हैं।

​डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी: एक क्रांतिकारी नेतृत्व
​डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी भारत की पहली महिला विधायक थीं और उन्होंने देवदासी प्रथा को समाप्त करने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया।
​1. व्यक्तिगत अनुभव और संकल्प
​मुथुलक्ष्मी रेड्डी का जन्म खुद एक देवदासी परिवार में हुआ था। उन्होंने अपनी आँखों से देखा था कि किस तरह धर्म के नाम पर कम उम्र की लड़कियों का शारीरिक और मानसिक शोषण किया जाता है। उन्होंने इस ‘पवित्र’ कहे जाने वाले कलंक को मिटाने का संकल्प लिया।

देवदासी प्रथा: एक ऐतिहासिक विश्लेषण एवं क्विज

DEVADASI PRATHA: एक गहरा विश्लेषण 📜

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1. परिचय और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

देवदासी प्रथा भारतीय उपमहाद्वीप में प्रचलित एक ऐसी धार्मिक परंपरा थी, जिसमें बहुजन समाज की कम उम्र की कन्याओं को देवताओं या मंदिरों को “समर्पित” कर दिया जाता था। ‘देवदासी’ शब्द का अर्थ है ‘ईश्वर की सेविका’। हालांकि, समय बीतने के साथ यह पवित्र उद्देश्य एक संस्थागत यौन शोषण और सामाजिक गुलामी के जाल में बदल गया। छठी शताब्दी के दौरान पल्लव और चोल वंश के समय यह प्रथा अपने चरम पर थी, जहाँ इन महिलाओं को नृत्य और संगीत की शिक्षा दी जाती थी।

2. शोषण का स्वरूप और कम उम्र की लड़कियों का दर्द

इस प्रथा के तहत सबसे भयानक शोषण ‘कन्नी कलयाणम’ जैसी रस्मों के माध्यम से होता था। जब एक बच्ची किशोरावस्था में पहुँचती थी, तो उसके कौमार्य की नीलामी की जाती थी। मंदिर के पुरोहित और स्थानीय जमींदार धर्म की आड़ में इन बच्चियों का शारीरिक शोषण करते थे। उन्हें समाज से अलग कर दिया जाता था और वे कभी सामान्य वैवाहिक जीवन नहीं जी सकती थीं। यह बहुजन बेटियों के मानवाधिकारों का सबसे क्रूर हनन था।

3. सामाजिक और आर्थिक आयाम

यह प्रथा केवल धार्मिक नहीं बल्कि जातिवादी और पितृसत्तात्मक थी। उच्च जातियों ने अपनी सत्ता और विलासिता को बनाए रखने के लिए बहुजन वर्ग की महिलाओं को इस दलदल में धकेला। इन महिलाओं के पास संपत्ति के अधिकार नहीं थे और वे पूरी तरह से मंदिर के दान पर निर्भर थीं।

4. समाज सुधारकों का महासंग्राम

डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने इस प्रथा को ‘बौद्धिक वेश्यावृत्ति’ और बहुजन समाज के अपमान का प्रतीक बताया। उन्होंने दलित वर्ग के सम्मेलनों में स्पष्ट कहा कि जब तक हम अपनी माताओं-बहनों को मंदिर की दासता से मुक्त नहीं करेंगे, तब तक हम स्वतंत्र नहीं कहलाएंगे। डॉ. मुथुलक्ष्मी रेड्डी ने 1920 के दशक में इसके खिलाफ कानूनी मोर्चा खोला, जिसका कट्टरपंथियों ने कड़ा विरोध किया।

5. आधुनिक कानून और वर्तमान स्थिति

आज 2026 में, भारत सरकार ने कड़े कानून बनाए हैं। कर्नाटक और महाराष्ट्र में विशेष पुनर्वास योजनाएं चल रही हैं। डिजिटल इंडिया के माध्यम से इन महिलाओं के बच्चों को शिक्षा और पहचान देने का कार्य किया जा रहा है। हालांकि, मानसिक रूप से इस प्रथा को जड़ से मिटाना अभी भी एक चुनौती है।

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​3. 'अव्वाई होम' (Avvai Home) की स्थापना
​केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं था। जिन लड़कियों को इस प्रथा से मुक्त कराया गया, उनके पास रहने के लिए घर और आजीविका का साधन नहीं था।
​उन्होंने 1930 में अव्वाई होम की स्थापना की, जहाँ इन महिलाओं को आश्रय, शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया गया ताकि वे समाज में सम्मान के साथ जी सकें।
​अन्य महापुरुषों का वैचारिक समर्थन
​डॉ. बी.आर. अंबेडकर का दृष्टिकोण
​बाबासाहेब ने हमेशा इस बात पर जोर दिया कि देवदासी प्रथा जातिवाद और पितृसत्ता का सबसे क्रूर मेल है।
​उन्होंने बहुजन समाज की सभाओं में सीधे तौर पर अपील की कि अपनी बेटियों को मंदिरों में न छोड़ें।
​अंबेडकर जी का मानना था कि जब तक बहुजन समाज अपनी महिलाओं का सम्मान सुरक्षित नहीं करेगा, तब तक वह राजनीतिक रूप से कभी स्वतंत्र नहीं हो पाएगा।
​पेरियार ई.वी. रामास्वामी (E.V. Ramasamy)
​तमिलनाडु में 'आत्म-सम्मान आंदोलन' (Self-Respect Movement) के माध्यम से पेरियार ने देवदासी प्रथा पर कड़ा प्रहार किया।
​उन्होंने इसे "ब्राह्मणवादी पितृसत्ता" का औजार बताया।
​उन्होंने देवदासी महिलाओं के पुनर्विवाह को बढ़ावा दिया और उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए बड़े पैमाने पर रैलियां कीं।
​कानूनी मील का पत्थर: मद्रास देवदासी अधिनियम (1947)
​दशकों के संघर्ष के बाद, 9 अक्टूबर 1947 को यह अधिनियम पारित हुआ। इसके मुख्य प्रावधान थे:
​मंदिरों में लड़कियों के समर्पण की रस्म (पोट्टू कट्टू) को गैर-कानूनी घोषित किया गया।
​देवदासियों को विवाह करने का कानूनी अधिकार दिया गया।
​इस प्रथा को बढ़ावा देने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए कठोर सजा का प्रावधान किया गया।
​वर्तमान स्थिति और चुनौतियाँ
​हालांकि कानून बन गए, लेकिन यह प्रथा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। कर्नाटक और महाराष्ट्र के कुछ सीमावर्ती इलाकों में 'येल्लम्मा देवी' के नाम पर आज भी गुप्त रूप से लड़कियों को समर्पित किया जाता है।
​आर्थिक कारण: आज भी गरीबी और अशिक्षा के कारण कुछ परिवार इस जाल में फंस जाते हैं।
​सामाजिक बहिष्कार: आज भी उन महिलाओं के बच्चों को समाज में वह दर्जा नहीं मिल पाता, जिसके वे हकदार हैं।

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