भारतीय संविधान का अनुच्छेद 79 भारत की लोकतांत्रिक शासन प्रणाली की उस बुनियाद को परिभाषित करता है जिसे हम ‘संसद’ के नाम से जानते हैं। यह अनुच्छेद न केवल एक संस्था की स्थापना करता है, बल्कि भारत के संसदीय लोकतंत्र के स्वरूप और उसकी संरचना का खाका भी खींचता है। संवैधानिक भाषा में कहें तो अनुच्छेद 79 स्पष्ट रूप से यह घोषणा करता है कि संघ के लिए एक संसद होगी जो राष्ट्रपति और दो सदनों से मिलकर बनेगी, जिनके नाम क्रमशः राज्यसभा (राज्यों की परिषद) और लोकसभा (जनता का सदन) होंगे। इस एक छोटे से वाक्य में भारत की पूरी विधायी शक्ति का सार समाहित है। सबसे महत्वपूर्ण बात जो यह अनुच्छेद स्पष्ट करता है, वह यह है कि भारत के राष्ट्रपति संसद का एक अनिवार्य और अभिन्न अंग हैं। आमतौर पर आम बोलचाल में लोग संसद का अर्थ केवल लोकसभा और राज्यसभा से लगाते हैं, लेकिन संवैधानिक रूप से राष्ट्रपति के बिना संसद अधूरी है। हालांकि राष्ट्रपति स्वयं किसी भी सदन में नहीं बैठते और न ही वे विधायी चर्चाओं में सीधे हिस्सा लेते हैं, लेकिन उनकी उपस्थिति और सहमति के बिना कोई भी विधायी कार्य पूर्ण नहीं माना जा सकता। यह व्यवस्था ब्रिटेन की ‘किंग-इन-पार्लियामेंट’ की अवधारणा से प्रेरित है, जहाँ सम्राट या साम्राज्ञी को संसद का हिस्सा माना जाता है। भारत में राष्ट्रपति को संसद का अंग इसलिए बनाया गया क्योंकि विधायी प्रक्रिया में उनकी भूमिका निर्णायक होती है। कोई भी विधेयक जो संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित किया जाता है, वह तब तक अधिनियम या कानून का रूप नहीं ले सकता जब तक कि उस पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर न हो जाएं। इसके अलावा, संसद के सत्रों को बुलाना, उनका सत्रावसान करना और आवश्यकता पड़ने पर लोकसभा को भंग करना भी राष्ट्रपति के संवैधानिक कर्तव्यों में शामिल है। जब संसद का सत्र नहीं चल रहा होता और देश को किसी तत्काल कानून की आवश्यकता होती है, तो राष्ट्रपति ही अनुच्छेद 123 के तहत अध्यादेश जारी करते हैं, जिसका प्रभाव संसद द्वारा बनाए गए कानून के बराबर ही होता है। इस प्रकार, अनुच्छेद 79 राष्ट्रपति को विधायी तंत्र की धुरी बना देता है। इसके बाद यह अनुच्छेद दो सदनों की बात करता है, जो भारत की ‘द्विसदनीय व्यवस्था’ (Bicameralism) को दर्शाता है। पहला सदन ‘राज्यसभा’ है, जिसे उच्च सदन भी कहा जाता है। जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट है, यह राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करता है। राज्यसभा की परिकल्पना एक ऐसे सदन के रूप में की गई है जो लोकसभा द्वारा जल्दबाजी में लिए गए निर्णयों पर पुनर्विचार कर सके और राज्यों के अधिकारों की रक्षा कर सके। यह एक स्थायी सदन है जो कभी पूरी तरह भंग नहीं होता, बल्कि इसके एक-तिहाई सदस्य हर दो साल में सेवानिवृत्त होते रहते हैं। यह निरंतरता सुनिश्चित करती है कि देश की विधायी प्रक्रिया में कभी पूर्ण विराम न लगे। दूसरी ओर ‘लोकसभा’ है, जिसे निम्न सदन या जनता का सदन कहा जाता है। यह भारतीय लोकतंत्र का सबसे प्रत्यक्ष और प्रभावशाली चेहरा है क्योंकि इसके सदस्य सीधे देश की वयस्क जनता द्वारा चुने जाते हैं। लोकसभा का मुख्य कार्य जनता की इच्छाओं और उनकी समस्याओं को कानून के माध्यम से संबोधित करना है। लोकसभा का कार्यकाल सामान्यतः पांच वर्ष का होता है, लेकिन विशेष परिस्थितियों में इसे पहले भी भंग किया जा सकता है। अनुच्छेद 79 द्वारा स्थापित यह त्रिकोणीय संरचना—राष्ट्रपति, राज्यसभा और लोकसभा—शक्ति के पृथक्करण और संतुलन (Checks and Balances) के सिद्धांत पर आधारित है। यदि लोकसभा जनता की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती है, तो राज्यसभा राज्यों के हितों और बौद्धिक विमर्श का केंद्र बनती है, और राष्ट्रपति इन दोनों के ऊपर एक संवैधानिक संरक्षक की भूमिका निभाते हैं जो यह सुनिश्चित करते हैं कि पारित होने वाला हर कानून संविधान की सीमाओं के भीतर हो। यह व्यवस्था यह भी सुनिश्चित करती है कि भारत एक एकात्मक राज्य के बजाय एक संघीय राष्ट्र के रूप में कार्य करे, जहाँ केंद्र और राज्यों के बीच सत्ता का संतुलन बना रहे। इस अनुच्छेद का महत्व इस बात में भी है कि यह भारत के गणतंत्र होने की पुष्टि करता है। भारत का राष्ट्रपति ब्रिटेन के राजा की तरह वंशानुगत नहीं होता, बल्कि एक निर्वाचित प्रतिनिधि होता है, जो संसद का अंग बनकर यह प्रमाणित करता है कि भारत की सर्वोच्च सत्ता अंततः जनता और उसके निर्वाचित प्रतिनिधियों में निहित है। अनुच्छेद 79 के बिना संसद की परिभाषा अधूरी रह जाती और भारतीय लोकतंत्र की पूरी संरचना अस्पष्ट होती। यह अनुच्छेद ही वह सूत्र है जो राष्ट्रपति की कार्यकारी शक्तियों को विधायी प्रक्रिया से जोड़ता है, जिससे शासन में एकरूपता और सामंजस्य बना रहता है। इस प्रकार, यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि अनुच्छेद 79 भारतीय संविधान के उन सबसे महत्वपूर्ण प्रावधानों में से एक है जो देश की राजनीतिक और विधायी संस्कृति का निर्धारण करते हैं। यह केवल एक प्रशासनिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह करोड़ों भारतीयों के विश्वास और उनकी लोकतांत्रिक भागीदारी का प्रतीक है, जहाँ हर कानून जनता की सहमति (लोकसभा), राज्यों की भागीदारी (राज्यसभा) और राष्ट्र प्रमुख की स्वीकृति (राष्ट्रपति) के समन्वय से बनता है।
🇮🇳 अनुच्छेद 79 महा-क्विज 🇮🇳
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भारतीय संविधान के भाग V (संघ) के अध्याय II के अंतर्गत अनुच्छेद 79 से 122 तक संसद के गठन, संरचना, अवधि, अधिकारियों, प्रक्रियाओं और शक्तियों का वर्णन किया गया है। अनुच्छेद 79 वह प्रारंभिक बिंदु है जो भारत की विधायी व्यवस्था की नींव रखता है। यह स्पष्ट करता है कि भारत में एक ‘संसद’ होगी, जो न केवल कानून बनाने वाली संस्था है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की सर्वोच्च अभिव्यक्ति भी है।
संसद का गठन: तीन स्तंभ
अनुच्छेद 79 के अनुसार, “संघ के लिए एक संसद होगी जो राष्ट्रपति और दो सदनों से मिलकर बनेगी, जिनके नाम क्रमशः राज्यसभा और लोकसभा होंगे।” यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राष्ट्रपति को संसद का अभिन्न अंग माना गया है। यद्यपि राष्ट्रपति किसी भी सदन का सदस्य नहीं होता और न ही वह विधायी बहसों में बैठता है, लेकिन उसकी सहमति के बिना कोई भी विधेयक कानून नहीं बन सकता।
1. भारत के राष्ट्रपति (The President of India)
राष्ट्रपति की भूमिका केवल औपचारिक नहीं है। वे भारतीय राज्य के प्रमुख हैं और विधायी प्रक्रिया में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है। संसद के सत्र को आहूत (Summon) करना, सत्रावसान (Prorogue) करना और लोकसभा को भंग करना उनकी संवैधानिक शक्ति है। जब संसद सत्र में न हो, तो वे अध्यादेश (Ordinance) जारी कर सकते हैं, जिसकी शक्ति संसद के कानून के बराबर होती है।
2. राज्यसभा (Council of States – Upper House)
अनुच्छेद 80 में इसकी संरचना दी गई है, लेकिन अनुच्छेद 79 इसे संसद के ‘द्वितीय सदन’ के रूप में स्थापित करता है। यह राज्यों का प्रतिनिधित्व करता है। इसमें 250 सदस्य होते हैं, जिनमें से 12 राष्ट्रपति द्वारा कला, साहित्य, विज्ञान और समाज सेवा के क्षेत्र से मनोनीत किए जाते हैं। यह एक ‘स्थायी सदन’ है, जिसका अर्थ है कि यह कभी भंग नहीं होता।
3. लोकसभा (House of the People – Lower House)
यह ‘प्रथम सदन’ है जो सीधे भारत की जनता का प्रतिनिधित्व करता है। इसके सदस्यों का चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर प्रत्यक्ष रूप से होता है। इसकी अधिकतम सदस्य संख्या 550 निर्धारित है। यह सदन सरकार की जवाबदेही तय करने में सबसे शक्तिशाली है क्योंकि मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति ही उत्तरदायी होती है।
द्विसदनीय व्यवस्था का औचित्य
भारत ने ब्रिटेन की तर्ज पर ‘वेस्टमिंस्टर मॉडल’ अपनाया है। द्विसदनीय व्यवस्था (Bicameralism) का मुख्य उद्देश्य शक्तियों का संतुलन है। लोकसभा जहाँ जनभावनाओं का प्रतिनिधित्व करती है, वहीं राज्यसभा राज्यों के हितों की रक्षा करती है और जल्दबाजी में लिए गए विधायी निर्णयों पर अंकुश लगाती है।
संसदीय लोकतंत्र की आत्मा
अनुच्छेद 79 यह सुनिश्चित करता है कि भारत में ‘कानून का शासन’ (Rule of Law) हो। यह संस्था कार्यपालिका पर नियंत्रण रखती है, देश के बजट को मंजूरी देती है और संविधान में संशोधन करने की शक्ति रखती है। यह विचार-विमर्श, वाद-विवाद और असहमति के सम्मान का मंच है।
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