DID THE MASTER KEY AND NAMAN ON FARMER DAY-

आज की प्रमुख ऐतिहासिक घटनाओं की संक्षिप्त सूची-
प्रमुख घटनाएँ
- 1902: पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह का जन्म, जिनके सम्मान में राष्ट्रीय किसान दिवस मनाया जाता है।[13][14]
- 1921: रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा विश्व भारती विश्वविद्यालय (शांतिनिकेतन) का उद्घाटन।[11]
- 1926: स्वतंत्रता सेनानी स्वामी श्रद्धानंद की हत्या।[12]
- 1968: भारत का पहला मौसम रॉकेट ‘मेनका’ प्रक्षेपित।[11]
अन्य उल्लेखनीय तिथियाँ
- 1912: वायसराय लॉर्ड हार्डिंग पर बम हमला।[13]
- 1995: मंडी डबवाली स्कूल आग कांड में 360 मौतें।[11]
- 2000: कलकत्ता का नाम कोलकाता 변경।[12]
- 2004: पूर्व पीएम पीवी नरसिम्हा राव का निधन।[11]
भारत में 23 दिसंबर को राष्ट्रीय किसान दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह दिन पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की जयंती पर आधारित है, जिन्हें किसानों के मसीहा के रूप में जाना जाता है।[1][2]
इतिहास
भारत सरकार ने 2001 में चौधरी चरण सिंह की जन्म तिथि 23 दिसंबर को राष्ट्रीय किसान दिवस घोषित किया। चरण सिंह (1902-1987) ने जमींदारी उन्मूलन, भूमि सुधार और किसान कल्याण के लिए महत्वपूर्ण कानून बनाए, जैसे उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन बिल। 1979 में उनका संक्षिप्त प्रधानमंत्री कार्यकाल भी ग्रामीण विकास पर केंद्रित रहा। तब से हर साल यह दिन किसानों के योगदान को याद करने का अवसर बन गया।[1][3]
महत्व
यह दिन किसानों को ‘अन्नदाता’ के रूप में सम्मानित करता है, जो भारत की 60% आबादी को रोजगार देते हैं और अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। किसानों की चुनौतियों जैसे कम आय, जलवायु परिवर्तन, कर्ज और बाजार समस्याओं पर जागरूकता बढ़ाता है। ग्रामीण विकास, खाद्य सुरक्षा और सतत कृषि को प्रोत्साहित करता है।[2][7]
उत्सव
देशभर में सेमिनार, कृषि प्रदर्शनियां, पुरस्कार वितरण और किसान मेलों का आयोजन होता है। सरकारी योजनाओं जैसे पीएम किसान सम्मान निधि की जानकारी दी जाती है। स्कूलों में निबंध प्रतियोगिताएं और जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं।[1][6]
चौधरी चरण सिंह का प्रारंभिक जीवन
चौधरी चरण सिंह का जन्म 23 दिसंबर 1902 को उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के नूरपुर गांव में एक जाट किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता लाल बहादुर सिंह एक साधारण किसान थे, जिन्होंने उन्हें ग्रामीण जीवन और कृषि के मूल्यों से परिचित कराया। बचपन से ही चरण सिंह ने खेतों में काम किया और गरीब किसानों की दुर्दशा को करीब से देखा, जो उनके जीवन का आधार बना। उन्होंने मेरठ के डीएवी कॉलेज से बीए और फिर कानून की डिग्री प्राप्त की। 1925 में वकालत शुरू की, लेकिन जल्द ही स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े।[1][4]
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान
1920 के दशक में चरण सिंह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े और असहयोग आंदोलन में सक्रिय हुए। 1930 में नमक सत्याग्रह और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया, जिसके लिए उन्हें जेल हुई। वे किसानों के अधिकारों के लिए हमेशा आगे रहे और जमींदारी प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई। स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उनकी पहचान एक ईमानदार और सिद्धांतवादी नेता के रूप में बनी। ग्रामीण भारत को ब्रिटिश शोषण से मुक्त करने के लिए उन्होंने कई आंदोलन चलाए।[1][6]
राजनीतिक करियर की शुरुआत
1946 में वे उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए चुने गए। 1952 में नेहरू मंत्रिमंडल में राजस्व मंत्री बने और जमींदारी उन्मूलन बिल पास कराया, जो उत्तर प्रदेश में पहला ऐसा कानून था। इस बिल ने लाखों किसानों को जमीन का मालिक बनाया। 1959 में वे उत्तर प्रदेश के गृह मंत्री बने। 1967 में पहली बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन अल्प समय बाद इस्तीफा देना पड़ा। 1968-1970 तक फिर मुख्यमंत्री रहे। इस दौरान उन्होंने चकबंदी कानून और भूमि संरक्षण कानून लागू किए, जो वैज्ञानिक खेती को बढ़ावा देते थे।[4][5]
केंद्र में भूमिका और लोक दल की स्थापना
1970 के दशक में कांग्रेस से मतभेद के कारण उन्होंने 1974 में भारतीय लोक दल की स्थापना की। 1977 के चुनाव में जनता पार्टी की जीत के बाद मोरारजी देसाई सरकार में गृह मंत्री और उप प्रधानमंत्री बने। उन्होंने मंडल आयोग और अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की। किसानों के हितों के लिए हमेशा संघर्ष किया। उनकी राजनीति का केंद्र ग्रामीण भारत था, जहां वे जमींदारों के खिलाफ किसानों के मसीहा बने।[1][6]
प्रधानमंत्री पद और संक्षिप्त कार्यकाल
28 जुलाई 1979 को वे भारत के पांचवें प्रधानमंत्री बने, जो गैर-कांग्रेसी सरकार थी। उनका कार्यकाल मात्र 23 दिन चला, क्योंकि इंदिरा गांधी ने समर्थन वापस ले लिया। फिर भी, इस दौरान उन्होंने ग्रामीण विकास मंत्रालय बनाया और किसान कल्याण पर जोर दिया। संसद में विश्वास मत साबित न कर पाने के बावजूद, उन्होंने सिद्धांतों पर अडिग रहकर इस्तीफा दिया। यह कार्यकाल छोटा था, लेकिन किसानों के लिए उनकी प्रतिबद्धता को उजागर करता है।[2][4]
किसान कल्याण के लिए नीतियां
चरण सिंह ने जीवनभर किसानों के लिए काम किया। जमींदारी उन्मूलन, भूमि सुधार, सहकारी खेती और न्यूनतम समर्थन मूल्य की वकालत की। उन्होंने ‘असली भारत’ नामक साप्ताहिक अखबार शुरू किया। ग्रामीण गरीबी हटाओ और उचित फसल मूल्यों पर बल दिया। उत्तर प्रदेश में उनके कानूनों ने लाखों भूमिहीनों को जमीन दी। वे भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के खिलाफ कड़े थे।[1][6]
व्यक्तिगत जीवन और सिद्धांत
चरण सिंह सादा जीवन जीते थे। वे गाय प्रेमी थे और शाकाहारी। पत्नी गायत्री देवी से विवाह 1923 में हुआ, जिनसे तीन पुत्र हुए। वे कभी फिजूलखर्ची नहीं करते थे। किताबें लिखीं जैसे ‘भारत के गरीब’ और ‘जमींदारी उन्मूलन’। ईमानदारी के लिए विपक्षी भी कायल थे। 29 मई 1987 को दिल्ली में उनका निधन हुआ।[10][5]
विरासत और सम्मान
उनकी जन्म तिथि 23 दिसंबर को 2001 से राष्ट्रीय किसान दिवस मनाया जाता है। 2024 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न मिला। नई दिल्ली में किसान घाट उनका स्मारक है। उनकी विरासत ग्रामीण भारत को सशक्त बनाने में है। आज भी किसान आंदोलन उन्हें याद करते हैं। लोक दल परिवार की राजनीति जारी है।[1][4]
किसान दिवस का महत्व
किसान दिवस पर देशभर में किसानों को सम्मानित किया जाता है। सेमिनार, कृषि प्रदर्शनियां और पुरस्कार वितरण होते हैं। यह चरण सिंह के विचारों को जीवंत रखता है। ग्रामीण विकास और किसान कल्याण पर बहस होती है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में यह दिन विशेष है।[1]
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