UP BASIC EDUCATION SCIENCE CLASS 5
उत्तर प्रदेश परिषदीय स्कूलों के कक्षा 5 की विज्ञान पुस्तक “प्रकृति” (Science) का एक बहुत ही महत्वपूर्ण पाठ है “जन्तुओं में अनुकूलन” (Adaptation in Animals)।
यहाँ इस पाठ को विस्तार से, चित्रों के वर्णन और उदाहरणों के साथ समझाया गया है:
पाठ: जन्तुओं में अनुकूलन (Adaptation)
अनुकूलन क्या है?
प्रत्येक जीव जिस वातावरण में रहता है, वहाँ जीवित रहने के लिए उसके शरीर में कुछ खास बदलाव या विशेषताएँ आ जाती हैं। इन विशेषताओं को ही अनुकूलन कहते हैं।
1. जलीय अनुकूलन (Aquatic Adaptation)
जो जीव पानी में रहते हैं, उनके शरीर की बनावट ऐसी होती है कि वे पानी में आसानी से तैर सकें और सांस ले सकें।
उदाहरण: मछली

- 1. शरीर की बनावट (Streamlined Body)
- मछली का धाराप्रवाह (Streamlined) होता है, यानी आगे और पीछे से नुकीला और बीच से चौड़ा। यह बनावट पानी के प्रतिरोध (Resistance) को कम करती है, जिससे मछली पानी में बहुत तेजी से तैर सकती है।
- 2. गलफड़े (Gills)
- मछलियाँ हमारी तरह फेफड़ों से सांस नहीं लेतीं। उनके पास गलफड़े (Gills) होते हैं।
- जब मछली मुंह से पानी लेती है, तो वह गलफड़ों के ऊपर से गुजरता है।
- गलफड़े पानी में घुली हुई ऑक्सीजन को सोख लेते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड बाहर निकाल देते
3. तैरने के लिए पंख (Fins) और पूँछ (Tail)
- पंख (Fins): मछली के शरीर पर मौजूद पंख उसे संतुलन बनाए रखने और दिशा बदलने में मदद करते हैं।
- पूँछ (Tail): मछली की पूँछ एक चप्पू की तरह काम करती है, जो उसे आगे की ओर धक्का देती है।
4. शल्क (Scales) और श्लेष्म (Mucus)
मछली की त्वचा पर शल्क (Scales) होते हैं जो सुरक्षा कवच का काम करते हैं। साथ ही, इनका शरीर एक चिपचिपे पदार्थ (श्लेष्म/Mucus) से ढका होता है, जो शरीर को जलरोधी (Waterproof) बनाता है और संक्रमण से बचाता है।
5. वायु थैली (Swim Bladder)
ज्यादातर मछलियों के अंदर एक वायु थैली होती है। इसमें हवा भरकर वे पानी की गहराई को नियंत्रित करती हैं। इसकी मदद से वे बिना तैरे भी पानी में एक ही जगह पर स्थिर रह सकती हैं।
6. पार्श्व रेखा तंत्र (Lateral Line System)
मछली के शरीर के दोनों ओर एक संवेदी रेखा होती है जिसे पार्श्व रेखा कहते हैं। यह पानी में होने वाले कंपन (Vibrations) और दबाव के बदलाव को महसूस करती है, जिससे मछली को शिकार या खतरे का पता चलता है।
2. स्थलीय अनुकूलन (Terrestrial Adaptation)

जमीन पर रहने वाले जीवों को चलने के लिए पैर और सांस लेने के लिए फेफड़ों की जरूरत होती है।
मरुस्थलीय (रेगिस्तान) अनुकूलन – ऊँट
1. ऊंट का अनुकूलन (Adaptation in Camel)
ऊंट को “रेगिस्तान का जहाज” कहा जाता है क्योंकि इसका शरीर अत्यधिक गर्मी और पानी की कमी को सहने के लिए बना है:
- कूबड़ (Hump): ऊंट के कूबड़ में वसा (Fat) जमा होती है। जब भोजन नहीं मिलता, तो वह इस वसा को ऊर्जा के रूप में उपयोग करता है।
- लंबे पैर: इसके लंबे पैर शरीर को गर्म रेत की तपिश से दूर रखते हैं।
- चौड़े और गद्दीदार पैर: इसके पैर नीचे से चौड़े और गद्दीदार होते हैं, जिससे वे रेत में धंसते नहीं हैं और ऊंट आसानी से दौड़ पाता है।
- पानी का संरक्षण: ऊंट एक बार में बहुत सारा पानी पी सकता है। उसे पसीना बहुत कम आता है और उसका मूत्र (Urine) बहुत गाढ़ा होता है, ताकि शरीर से पानी कम से कम बाहर निकले।
- लंबी पलकें और नाक: इसकी पलकें लंबी होती हैं और यह अपनी नाक के नथुने बंद कर सकता है, ताकि धूल भरी आंधी में रेत आंखों और नाक में न घुसे।
- कंटीली झाड़ियाँ खाना: इसकी जीभ और मुंह की त्वचा बहुत सख्त होती है, जिससे यह रेगिस्तान की कटीली झाड़ियों को भी आसानी से चबा लेता है।
- गद्दीदार पैर: ऊँट के पैर नीचे से चौड़े और गद्दीदार होते हैं, जो उसे तपती रेत में धँसने से बचाते हैं।
- जल संचयन: यह एक बार में बहुत अधिक पानी पी सकता है और इसे पसीना कम आता है, जिससे शरीर में पानी बचा रहता है।
3. वायवीय अनुकूलन (Aerial Adaptation)

आकाश में उड़ने वाले पक्षियों का शरीर हवा में भार कम करने के लिए बना होता है।
- खोखली हड्डियाँ (Pneumatic Bones): पक्षियों की हड्डियाँ बहुत हल्की और अंदर से खोखली होती हैं।
- पंख (Wings): इनके अग्रपाद (Forelimbs) पंखों में बदल जाते हैं जो उड़ने के काम आते हैं।
- नौकाकार शरीर: इनका शरीर भी हवा को चीरने के लिए आगे से नुकीला होता है।
4. उभयचर अनुकूलन (Amphibian Adaptation)

जो जीव पानी और जमीन दोनों पर रहते हैं, जैसे मेंढक।
मेंढक का अनुकूलन (Adaptation in Frog)
मेंढक एक उभयचर (Amphibian) है, जिसका अर्थ है कि यह पानी और जमीन दोनों पर रह सकता है। इसके अनुकूलन इस प्रकार हैं:
- दोहरी श्वसन प्रणाली (Double Breathing): * जब मेंढक जमीन पर होता है, तो वह फेफड़ों से सांस लेता है।
-
- जब वह पानी के अंदर होता है, तो वह अपनी नम त्वचा (Moist Skin) के माध्यम से ऑक्सीजन लेता है।
- मजबूत पिछले पैर (Strong Hind Legs): मेंढक के पिछले पैर बहुत लंबे और शक्तिशाली होते हैं, जो उसे जमीन पर लंबी छलांग लगाने और पानी में तैरने के लिए धक्का देने में मदद करते हैं।
- जालदार पैर (Webbed Feet): इसके पंजों के बीच पतली त्वचा (जाल) होती है, जो तैरते समय चप्पू की तरह काम करती है।
- चिपचिपी जीभ (Sticky Tongue): इसकी जीभ लंबी और चिपचिपी होती है, जिसे यह तेजी से बाहर निकालकर उड़ते हुए कीड़ों को पकड़ लेता है।
- उभरी हुई आँखें: मेंढक की आँखें सिर के ऊपर उभरी होती हैं, जिससे वह पानी की सतह पर तैरते समय भी पानी के बाहर का खतरा देख सकता है।
- त्वचा का रंग: इसकी त्वचा का रंग अक्सर आसपास के वातावरण (घास या काई) जैसा होता है, जिससे यह दुश्मनों से छुपा रहता है (इसे छद्मवरण या Camouflage कहते हैं)।
- जालदार पैर (Webbed Feet): मेंढक के पिछले पैरों की उंगलियों के बीच पतली त्वचा (जाल) होती है, जो तैरते समय चप्पू का काम करती है।
- दोहरी श्वसन प्रणाली: यह जमीन पर फेफड़ों से और पानी के अंदर अपनी नम त्वचा (Moist skin) से सांस लेता है।
- इसके पैरों की उंगलियों के बीच एक जाल (Webbed feet) होता है, जो उसे पानी में तैरने में पतवार की तरह मदद करता है।
- यह त्वचा और फेफड़ों दोनों से सांस ले सकता है।
अभ्यास प्रश्न और उत्तर (Q&A)
प्रश्न 1: अनुकूलन किसे कहते हैं?
उत्तर: आकृति, आकार, रंग-रूप और संरचना में होने वाले वे परिवर्तन जो जीव को उसके वातावरण में सफलतापूर्वक जीवित रहने में मदद करते हैं, अनुकूलन कहलाते हैं।
प्रश्न 2: पक्षी आसमान में आसानी से कैसे उड़ लेते हैं?
उत्तर: पक्षियों की हड्डियाँ खोखली और हल्की होती हैं, शरीर का आकार नौकाकार होता है और उनके अग्रपाद पंखों में रूपांतरित होते हैं, जो उन्हें उड़ने में मदद करते हैं।
प्रश्न 3: ऊँट को “रेगिस्तान का जहाज” क्यों कहते हैं?
उत्तर: ऊँट अपने गद्दीदार पैरों की वजह से रेत पर आसानी से चल और दौड़ सकता है। वह बिना पानी के कई दिनों तक रह सकता है, इसलिए उसे रेगिस्तान का जहाज कहते
अनुकूलन (Adaptability) टेस्ट
प्रश्न 1/10
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