राष्ट्रीय बालिका दिवस (24 जनवरी) केवल एक तारीख नहीं, बल्कि देश की आधी आबादी के सामर्थ्य को पहचानने और उन्हें समान अवसर देने का संकल्प है
भारत में बालिकाओं को शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में अधिकार दिलाने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं।
1. शिक्षा का अधिकार: कलम से बदलाव तक
समान अवसर: अब बेटियाँ केवल प्राथमिक शिक्षा तक सीमित नहीं हैं; ‘सुकन्या समृद्धि योजना’ जैसी पहलों ने उनकी उच्च शिक्षा के लिए वित्तीय सुरक्षा सुनिश्चित की है।
डिजिटल साक्षरता: स्टेम (STEM – Science, Technology, Engineering, Math) शिक्षा में लड़कियों की भागीदारी बढ़ाने के लिए सरकार विशेष छात्रवृत्ति और प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रही है।
2. सभी क्षेत्रों में अधिकार: सीमाओं का टूटना
आज की बालिकाएँ केवल घर की चहारदीवारी तक सीमित नहीं हैं। कानून और सामाजिक सुधारों ने उन्हें हर क्षेत्र में बराबरी का हक दिया है:
1- सैन्य और रक्षा: हाल के वर्षों में बालिकाओं के लिए सैनिक स्कूलों के दरवाजे खोले गए और उन्हें सेना में कॉम्बैट रोल (युद्धक भूमिकाओं) और ‘परमानेंट कमीशन’ मिलने लगा है।
2- खेल जगत: ‘खेलो इंडिया’ जैसे कार्यक्रमों ने ग्रामीण क्षेत्रों की प्रतिभाओं को विश्व स्तर पर चमकने का मौका दिया है।
3- संपत्ति का अधिकार: हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में संशोधनों ने सुनिश्चित किया कि बेटियों का अपने पिता की संपत्ति पर बेटों के बराबर कानूनी अधिकार है।
3. सामाजिक और स्वास्थ्य सुरक्षा
एक सशक्त बालिका के लिए उसका स्वास्थ्य और सुरक्षा सबसे पहले आती है।
1- पोषण: ‘पोषण अभियान’ के माध्यम से किशोरियों के स्वास्थ्य और एनीमिया जैसी समस्याओं पर ध्यान दिया जा रहा है।
2 – बाल विवाह का विरोध: विवाह की कानूनी उम्र को बढ़ाने के प्रस्ताव और सख्त कानूनों ने बालिकाओं को कम उम्र में जिम्मेदारियों के बोझ से बचाकर उनके विकास पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर दिया है।
भारत में बालिकाओं और महिलाओं को पढ़ने का अधिकार दिलाने और उनके लिए शिक्षा के द्वार खोलने का श्रेय मुख्य रूप से महात्मा ज्योतिराव फुले और उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले को जाता है।
इनके योगदान को निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:
1 – पहला बालिका विद्यालय: ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले ने 1848 में पुणे (महाराष्ट्र) में लड़कियों के लिए भारत का पहला स्कूल खोला था। उस दौर में महिलाओं की शिक्षा को सामाजिक बुराई माना जाता था, लेकिन उन्होंने इस रूढ़िवाद को चुनौती दी।
2- सावित्रीबाई फुले – पहली महिला शिक्षिका: सावित्रीबाई फुले को भारत की पहली महिला शिक्षिका होने का गौरव प्राप्त है। उन्होंने न केवल लड़कियों को पढ़ाया, बल्कि उनके अधिकारों के लिए संघर्ष भी किया।
3- सामाजिक विरोध का सामना: जब सावित्रीबाई स्कूल पढ़ाने जाती थीं, तो लोग उन पर कीचड़ और पत्थर फेंकते थे ताकि वे पढ़ाना छोड़ दें, लेकिन वे विचलित नहीं हुईं और अपना कार्य जारी रखा।
4 – सभी वर्गों के लिए शिक्षा: उन्होंने समाज के दबे-कुचले और वंचित वर्गों की बालिकाओं को शिक्षा से जोड़कर एक नई क्रांति की शुरुआत की।
कानूनी रूप से:
आजादी के बाद, भारत के संविधान के निर्माता डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने संविधान के माध्यम से सभी नागरिकों (चाहे वे पुरुष हों या महिला) को शिक्षा और समानता का मौलिक अधिकार दिया। इसके बाद 2009 में ‘शिक्षा का अधिकार’ (RTE) कानून लागू हुआ, जिसने 6 से 14 वर्ष की हर बालिका के लिए शिक्षा को अनिवार्य और मुफ्त बना दिया।
महत्वपूर्ण संदेश (निष्कर्ष)
जब आप एक लड़के को शिक्षित करते हैं, तो आप एक व्यक्ति को शिक्षित करते हैं; लेकिन जब आप एक लड़की को शिक्षित करते हैं, तो आप पूरे परिवार और आने वाली पीढ़ियों को शिक्षित करते हैं।”