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महाड सत्याग्रह 1927 – डॉ. बी.आर. अंबेडकर


महाड़ सत्याग्रह 1927

महाड़ सत्याग्रह भारतीय नागरिक अधिकार आंदोलन का एक मील का पत्थर है।

डॉ. अंबेडकर ने चवदार तालाब के पानी को छूकर सामाजिक समानता का दावा किया।

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को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में हुआ महाड़ सत्याग्रह भारतीय इतिहास की एक युगांतकारी घटना थी। डॉ. भीमराव अंबेडकर को इस आंदोलन के लिए “विवश” या प्रेरित होना पड़ा क्योंकि उस समय की सामाजिक संरचना मानवीय गरिमा के विरुद्ध थी। बॉम्बे लेजिस्लेटिव काउंसिल ने 1923 में ‘सी.के. बोले’ प्रस्ताव पारित किया था, जिसके अनुसार सरकारी खर्च से बने सार्वजनिक जल स्रोतों का उपयोग सभी नागरिक कर सकते थे। हालांकि, महाड़ नगर पालिका ने इस नियम को कागजों पर तो अपनाया, लेकिन धरातल पर दलित समाज को चवदार तालाब से पानी पीने की अनुमति नहीं थी। बाबासाहेब ने महसूस किया कि जब तक कानून को व्यवहार में नहीं लाया जाएगा, तब तक वह केवल एक मृत अक्षर बनकर रह जाएगा।

​इस सत्याग्रह का मुख्य उद्देश्य केवल पानी पीना नहीं था, बल्कि यह सिद्ध करना था कि अछूत भी इंसान हैं और उनके पास भी वही मौलिक अधिकार हैं जो अन्य नागरिकों के पास हैं। डॉ. अंबेडकर ने देखा कि पशुओं को उस तालाब से पानी पीने की अनुमति थी, लेकिन एक इंसान को सिर्फ उसकी जाति के कारण वंचित रखा गया था। यह अपमानजनक स्थिति उन्हें एक निर्णायक कदम उठाने के लिए मजबूर कर गई। हजारों सत्याग्रहियों के साथ तालाब की ओर बढ़ते हुए, बाबासाहेब ने अपने हाथों में जल लेकर उसे पिया। यह कृत्य सदियों पुरानी दासता की बेड़ियों को तोड़ने का एक प्रतीकात्मक शंखनाद था।

​इस आंदोलन के पीछे एक और गहरा कारण सवर्णों का वह झूठा अहंकार था, जिसने सार्वजनिक संपत्ति को अपनी निजी जागीर समझ लिया था। जब दलितों ने पानी पिया, तो उसके बाद सवर्णों ने “शुद्धिकरण” के नाम पर तालाब में गोबर और गौमूत्र डाला। इस संकुचित मानसिकता ने डॉ. अंबेडकर को यह विश्वास दिलाया कि हिंदू धर्म के भीतर रहते हुए समानता की लड़ाई बहुत लंबी और कठिन है। महाड़ सत्याग्रह ने ही भविष्य में ‘मनुस्मृति दहन’ और अंततः ‘धम्म परिवर्तन’ की नींव रखी। यह आंदोलन इस बात का प्रमाण था कि अधिकार मांगे नहीं जाते, बल्कि संघर्ष करके छीने जाते हैं।

​डॉ. अंबेडकर ने इस सत्याग्रह के माध्यम से दलित समाज में चेतना पैदा की और उन्हें संगठित होने, शिक्षित होने और संघर्ष करने का मंत्र दिया। उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि यह लड़ाई किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि उस अमानवीय व्यवस्था के खिलाफ है जो इंसान को इंसान नहीं समझती। आज भी महाड़ सत्याग्रह को “सामाजिक लोकतंत्र” की दिशा में पहला ठोस कदम माना जाता है, जिसने भारतीय संविधान की प्रस्तावना में निहित ‘समानता’ और ‘बंधुत्व’ के आदर्शों को जन्म दिया

महाड़ सत्याग्रह बाल प्रश्नोत्तरी 🎓
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🐘 महाड़ सत्याग्रह ज्ञान यात्रा 🖋️

अंक: 0 | प्रश्न: 1/50
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