कक्षा 8 इतिहास पाठ 10: अंग्रेज भारत छोड़ने को विवश – सम्पूर्ण तैयारी और क्विज 🇮🇳
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का अंतिम चरण सबसे निर्णायक और ऊर्जा से भरा था। यूपी बोर्ड कक्षा 8 की पुस्तक ‘हमारा इतिहास और नागरिक जीवन’ का पाठ 10 (अंग्रेज भारत छोड़ने को विवश) हमें उस दौर की याद दिलाता है जब देश का हर नागरिक सड़कों पर था। इस ब्लॉग में हम इस पाठ के महत्वपूर्ण बिंदुओं और परीक्षा उपयोगी प्रश्नों का विश्लेषण करेंगे।
मुख्य बिंदु (Analysis):
- भारत छोड़ो आंदोलन (1942): गांधीजी का ‘करो या मरो’ का आह्वान जिसने अंग्रेजों के लिए भारत में टिकना असंभव कर दिया।
- आजाद हिंद फौज: नेताजी सुभाष चंद्र बोस का ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’ का नारा और सिंगापुर से दिल्ली तक का सफर।
- कैबिनेट मिशन और स्वतंत्रता: 1946 के राजनीतिक घटनाक्रम और माउंटबेटन योजना के तहत भारत की आजादी की राह।
स्वयं को परखें (Interactive Quiz):
हमने छात्रों के लिए एक विशेष डिजिटल क्विज तैयार की है जिसमें तिरंगा थीम और साउंड इफेक्ट्स शामिल हैं। यह न केवल मनोरंजक है बल्कि याद रखने में भी सहायक है।
निष्कर्ष:
यह पाठ न केवल परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह हमारे गौरवशाली इतिहास की धरोहर भी है। (Angrez Bharat Chhodne Ko Vivash Class 8) के नोट्स और प्रश्न उत्तर नीचे दिए गए लिंक से प्राप्त करें।
हमारा इतिहास और नागरिक जीवन III
पाठ 10: अंग्रेज भारत छोड़ने को विवश
1. पाठ का विस्तार से परिचय
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान और उसके बाद की परिस्थितियां भारत की स्वतंत्रता के लिए निर्णायक साबित हुईं। 1939 में जब द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ, तो ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों की सहमति के बिना भारत को युद्ध में झोंक दिया। इसके विरोध में कांग्रेस के प्रांतीय मंत्रिमंडलों ने इस्तीफा दे दिया। यह वह समय था जब भारतीय जनमानस में अंग्रेजों के प्रति भारी असंतोष था। ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों, आर्थिक शोषण और युद्ध के कारण बढ़ती महंगाई ने भारतीयों को संघर्ष के अंतिम दौर के लिए तैयार कर दिया। क्रिप्स मिशन की विफलता ने यह स्पष्ट कर दिया कि अंग्रेज स्वेच्छा से सत्ता नहीं छोड़ेंगे। गांधीजी ने ‘करो या मरो’ का नारा देकर जनता को जागृत किया। यह पाठ हमें बताता है कि किस प्रकार सामूहिक आंदोलनों, क्रांतिकारी गतिविधियों, आजाद हिन्द फ़ौज के पराक्रम और नौसेना विद्रोह ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी, जिससे वे भारत छोड़ने को विवश हो गए।
2. व्यक्तिगत सत्याग्रह (1940 ई0)
जब ब्रिटिश सरकार ने युद्ध के लक्ष्यों में भारतीयों की भागीदारी को स्पष्ट नहीं किया, तब गांधीजी ने सामूहिक आंदोलन के बजाय ‘व्यक्तिगत सत्याग्रह’ का मार्ग चुना। इसका मुख्य उद्देश्य युद्ध के विरुद्ध प्रचार करना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दावा करना था। इस आंदोलन के तहत चुने हुए सत्याग्रही सार्वजनिक स्थानों पर जाकर युद्ध विरोधी भाषण देते थे और अपनी गिरफ्तारी देते थे। विनोबा भावे पहले व्यक्तिगत सत्याग्रही थे, उनके बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू दूसरे सत्याग्रही बने। इस आंदोलन ने यह संदेश दिया कि भारतीय जनता युद्ध में अंग्रेजों के साथ नहीं है और वे पूर्ण स्वराज से कम कुछ भी स्वीकार नहीं करेंगे। लगभग 25,000 सत्याग्रहियों ने गिरफ्तारी दी, जिससे अंग्रेजों को अहसास हुआ कि भारत में शासन करना अब आसान नहीं होगा।
3. भारत छोड़ो आंदोलन (1942 ई0)
8 अगस्त 1942 को बम्बई के ग्वालिया टैंक मैदान में कांग्रेस ने ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पारित किया। गांधीजी ने देश को “करो या मरो” (Do or Die) का मंत्र दिया। अगले ही दिन सुबह ‘ऑपरेशन जीरो आवर’ के तहत सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। नेतृत्वहीन होने के बावजूद यह आंदोलन स्वतःस्फूर्त तरीके से पूरे देश में फैल गया। छात्रों, मजदूरों और किसानों ने संचार साधनों को नष्ट किया, थानों और डाकघरों पर हमले किए। कई स्थानों जैसे बलिया, सतारा और तामलुक में ‘समानांतर सरकारें’ स्थापित की गईं। सरकार ने भारी दमन चक्र चलाया, हवाई बमबारी की और हजारों लोगों को जेल भेजा, लेकिन जनता का मनोबल नहीं टूटा। इस आंदोलन ने साबित कर दिया कि भारत अब और अधिक समय तक गुलाम नहीं रह सकता।
4. क्रांतिकारी एवं भूमिगत गतिविधियां
क्रन्तिकारी गतिविधियां (100 शब्द)
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जब मुख्य नेता जेल में थे, तब युवा क्रांतिकारियों ने मोर्चा संभाला। क्रांतिकारी समूहों ने सरकारी खजानों को लूटना और रेल की पटरियां उखाड़ना शुरू किया ताकि ब्रिटिश रसद रोकी जा सके। इन गतिविधियों का उद्देश्य ब्रिटिश प्रशासन को पंगु बनाना था। क्रांतिकारियों ने हिंसा का सहारा लेकर अंग्रेजों के मन में भय पैदा किया और यह संदेश दिया कि भारतीय युवा अपनी आजादी के लिए बलिदान देने को तैयार हैं।
भूमिगत गतिविधियां (100 शब्द)
अच्युत पटवर्धन, अरुणा आसफ अली, राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण जैसे नेताओं ने भूमिगत रहकर आंदोलन का संचालन किया। उन्होंने गुप्त रेडियो स्टेशन (जैसे उषा मेहता का रेडियो) चलाए और पत्रक बांटे ताकि जनता का उत्साह बना रहे। भूमिगत गतिविधियों ने आंदोलन की मशाल को तब भी जलाए रखा जब दमन अपने चरम पर था। इन गुप्त सूचना तंत्रों ने आंदोलन को रणनीति प्रदान की।
5. आजाद हिन्द फ़ौज का संघर्ष
सुभाष चन्द्र बोस ने ‘दिल्ली चलो’ और ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा’ के नारों के साथ देश के बाहर से ब्रिटिश शासन को चुनौती दी। रासबिहारी बोस द्वारा गठित और नेताजी द्वारा पुनर्गठित आजाद हिन्द फ़ौज (INA) ने बर्मा (म्यांमार) की सीमाओं से भारत में प्रवेश करने का प्रयास किया। कोहिमा और इम्फाल के मोर्चों पर सैनिकों ने अदम्य साहस दिखाया। भले ही युद्ध की परिस्थितियों के कारण उन्हें पीछे हटना पड़ा, लेकिन INA के बलिदानों ने भारतीय सेना के भीतर राष्ट्रवाद की भावना भर दी। लाल किले में चले INA के मुकदमों ने पूरे देश को एकजुट कर दिया, जिससे ब्रिटिश सरकार की सैन्य निष्ठा पर सवाल खड़े हो गए।
6. सैनिको का विद्रोह (1946)
फरवरी 1946 में रॉयल इंडियन नेवी (नौसेना) के सैनिकों ने खराब भोजन और नस्लीय भेदभाव के विरोध में ‘आईएनएस तलवार’ पर विद्रोह कर दिया। यह विद्रोह कराची से लेकर कलकत्ता तक फैल गया। सैनिकों ने तिरंगा फहराया और ‘जय हिन्द’ के नारे लगाए। इसके साथ ही वायु सेना और पुलिस में भी असंतोष की लहर दौड़ गई। यह अंग्रेजों के लिए सबसे खतरनाक संकेत था क्योंकि उनकी सत्ता का मुख्य स्तंभ ‘भारतीय सेना’ अब उनके नियंत्रण से बाहर हो रही थी। सरदार पटेल के हस्तक्षेप के बाद सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया, लेकिन इसने अंग्रेजों को यकीन दिला दिया कि अब उनके जाने का समय आ गया है।
7. कैबिनेट मिशन (1946)
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन की लेबर पार्टी की सरकार ने भारत की संवैधानिक समस्या के समाधान के लिए तीन मंत्रियों का एक दल भेजा, जिसे ‘कैबिनेट मिशन’ कहा गया। इसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित थे:
- भारत में एक संघ की स्थापना की जाए जिसमें ब्रिटिश भारत और देशी रियासतें शामिल हों।
- संविधान निर्माण के लिए एक ‘संविधान सभा’ का गठन किया जाए।
- एक अंतरिम सरकार की स्थापना की जाए जिसमें सभी प्रमुख राजनीतिक दल शामिल हों।
- प्रांतों को समूहों (Groups) में विभाजित करने का प्रस्ताव दिया गया।
8. भारतीय स्वाधीनता अधिनियम (1947)
लॉर्ड माउंटबेटन की योजना के आधार पर ब्रिटिश संसद ने 18 जुलाई 1947 को ‘भारतीय स्वाधीनता अधिनियम’ पारित किया। इस अधिनियम के द्वारा 15 अगस्त 1947 को भारत को दो स्वतंत्र अधिराज्यों (डोमिनियन) – भारत और पाकिस्तान में विभाजित करने का निर्णय लिया गया। ब्रिटिश सम्राट का भारत पर से प्रभुत्व समाप्त हो गया और ‘भारत का सम्राट’ पद हटा दिया गया। दोनों देशों को अपना संविधान बनाने की पूर्ण शक्ति दी गई। जब तक नया संविधान नहीं बन जाता, तब तक 1935 के अधिनियम के अनुसार शासन चलाने की व्यवस्था की गई। इस अधिनियम ने सदियों की गुलामी की जंजीरों को काटकर भारत के एक नए युग का सूत्रपात किया।
9. भारत का विभाजन (विस्तार से)
भारत का विभाजन आधुनिक इतिहास की सबसे दुखद और हृदय विदारक घटनाओं में से एक है। मुस्लिम लीग द्वारा ‘द्वि-राष्ट्र सिद्धांत’ पर अड़े रहने और ‘प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस’ (Direct Action Day) के कारण हुए सांप्रदायिक दंगों ने देश को विभाजन की ओर धकेल दिया। लॉर्ड माउंटबेटन ने निष्कर्ष निकाला कि देश को गृहयुद्ध से बचाने का एकमात्र रास्ता विभाजन ही है। पंजाब और बंगाल का बंटवारा रेडक्लिफ रेखा के आधार पर किया गया। विभाजन के साथ ही मानवता के इतिहास का सबसे बड़ा विस्थापन शुरू हुआ। लाखों लोग सीमाओं के आर-पार जाने को मजबूर हुए। इस दौरान भयंकर सांप्रदायिक दंगे हुए, जिनमें लाखों निर्दोष लोग मारे गए। संपत्ति का विनाश हुआ और परिवारों के टुकड़े हो गए। गांधीजी विभाजन से बहुत दुखी थे और उन्होंने दंगों को रोकने के लिए नोआखली में पदयात्रा की। 14 अगस्त को पाकिस्तान और 15 अगस्त की मध्यरात्रि को भारत स्वतंत्र राष्ट्र बने। आज़ादी की खुशी के साथ विभाजन का यह दर्द हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया।
अभ्यास प्रश्नोत्तरी (इमेज के अनुसार)
1. बहुविकल्पीय प्रश्न
(1) भारतीय स्वाधीनता अधिनियम पारित हुआ – (ख) 1947 ई0 में
(2) फॉरवर्ड ब्लॉक का संबंध है – (घ) सुभाष चन्द्र बोस
2. अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
(1) सत्याग्रह करने वाले पहले व्यक्ति कौन थे?
उत्तर: व्यक्तिगत सत्याग्रह करने वाले पहले व्यक्ति आचार्य विनोबा भावे थे। गांधीजी ने 1940 में उन्हें प्रथम सत्याग्रही के रूप में चुना था। उन्होंने युद्ध विरोधी नारों के साथ इस अहिंसक संघर्ष की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य ब्रिटिश नीतियों के प्रति विरोध दर्ज करना था। उनके बाद नेहरू जी दूसरे सत्याग्रही बने।
(2) ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा’, यह कथन किसका है?
उत्तर: यह सुप्रसिद्ध नारा नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का है। उन्होंने आजाद हिन्द फ़ौज के सैनिकों और प्रवासी भारतीयों को संबोधित करते हुए यह आह्वान किया था। इसका अर्थ था कि स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए भारी बलिदान और संघर्ष की आवश्यकता है, और वे इसके बदले देश को मुक्त कराने का संकल्प लेते हैं।
3. लघु उत्तरीय प्रश्न
(1) अंग्रेज भारत छोड़ने के लिए क्यों विवश हुए? किन्हीं तीन कारणों को लिखिए।
उत्तर: अंग्रेज भारत छोड़ने के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित तीन कारणों से विवश हुए:
1. जन-आंदोलनों का दबाव: ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन ने ब्रिटिश शासन की जड़ें हिला दी थीं। जनता का आक्रोश चरम पर था।
2. आजाद हिन्द फ़ौज और सैन्य विद्रोह: नेताजी के संघर्ष और 1946 के नौसेना विद्रोह ने अंग्रेजों को यह बता दिया कि अब वे भारतीय सैनिकों के दम पर भारत में राज नहीं कर सकते।
3. अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियां: द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन की आर्थिक और सैन्य स्थिति बहुत कमजोर हो गई थी। साथ ही, अमेरिका और सोवियत संघ जैसे देशों का भारत को स्वतंत्र करने के लिए वैश्विक दबाव बढ़ रहा था।
(2) कैबिनेट मिशन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर: 1946 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने भारत की राजनीतिक समस्याओं को सुलझाने और सत्ता के हस्तांतरण की प्रक्रिया शुरू करने के लिए तीन मंत्रियों का एक दल भेजा, जिसे ‘कैबिनेट मिशन’ कहा जाता है। इसमें पैथिक लॉरेंस, स्टैफोर्ड क्रिप्स और ए.वी. अलेक्जेंडर शामिल थे। इस मिशन का उद्देश्य भारत के लिए एक नया संविधान बनाने की रूपरेखा तैयार करना और एक अंतरिम सरकार का गठन करना था। हालांकि, मुस्लिम लीग और कांग्रेस के बीच पूर्ण सहमति न बन पाने के कारण इसके कुछ प्रस्तावों को लेकर विवाद बना रहा, फिर भी इसने संविधान सभा के गठन का मार्ग प्रशस्त किया।
4. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
(1) 1935 ई0 के अधिनियम के अंतर्गत प्रांतों की सरकार क्यों गठित की गई?
उत्तर: 1935 के भारत सरकार अधिनियम का एक मुख्य उद्देश्य भारत में ‘प्रांतीय स्वायत्तता’ (Provincial Autonomy) लागू करना था। इसके तहत प्रांतों में द्वैध शासन समाप्त कर उन्हें अपने आंतरिक मामलों में निर्णय लेने का अधिकार दिया गया। 1937 में इसी अधिनियम के आधार पर चुनाव कराए गए ताकि भारतीय नेता शासन चलाने का अनुभव प्राप्त कर सकें और उत्तरदायी सरकार का गठन हो सके। कांग्रेस ने 11 में से 8 प्रांतों में सरकारें बनाईं। इन सरकारों का गठन इसलिए किया गया था ताकि नागरिक सुविधाओं, शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार किया जा सके और यह दिखाया जा सके कि भारतीय स्वयं शासन करने में सक्षम हैं। हालांकि, इन सरकारों के पास सीमित शक्तियां थीं, फिर भी इन्होंने जनहित के अनेक कार्य किए, जिससे जनता में स्वराज के प्रति विश्वास बढ़ा।
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