कक्षा 6 इतिहास पाठ 12 दक्षिण भारत (6वीं से 11वीं शताब्दी) संपूर्ण हल
पाठ- 12, “दक्षिण भारत ( छठी से ग्यारहवीं शताब्दी )
पाठ की संक्षिप्त समरी (4 पंक्तियाँ)
- छठी से ग्यारहवीं शताब्दी के दौरान दक्षिण भारत में राष्ट्रकूट, चालुक्य, पल्लव और चोल जैसे शक्तिशाली राजवंशों का उदय हुआ।
- इन राजाओं ने न केवल विशाल साम्राज्यों का निर्माण किया, बल्कि कला, साहित्य और भव्य मंदिरों (जैसे महाबलीपुरम और तंजौर) को भी संरक्षण दिया।
- इस काल में भक्ति आंदोलन का प्रसार हुआ और कृषि तथा समुद्री व्यापार के कारण दक्षिण भारत आर्थिक रूप से अत्यंत समृद्ध बना।
- दक्षिण भारत का सांस्कृतिक प्रभाव विदेशों (दक्षिण-पूर्वी एशिया) तक फैला, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण कंबोडिया का ‘अंकोरवाट मंदिर’ है।
विस्तृत लेख: दक्षिण भारत का स्वर्णिम काल (6वीं-11वीं शताब्दी)
प्रस्तावना
भारतीय इतिहास में छठी से ग्यारहवीं शताब्दी का समय दक्षिण भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। जब उत्तर भारत में हर्षवर्धन का शासन था, उसी समय दक्षिण में कई शक्तिशाली साम्राज्य अपनी जड़ें जमा रहे थे। इन साम्राज्यों ने न केवल युद्धों में अपनी वीरता दिखाई, बल्कि स्थापत्य कला (Architecture) और साहित्य में भी नए कीर्तिमान स्थापित किए।
प्रमुख राजवंशों का परिचय
1. राष्ट्रकूट वंश
राष्ट्रकूट वंश की स्थापना दन्तिदुर्ग ने की थी। इन्होंने मान्यखेट (आधुनिक मालखेड़) को अपनी राजधानी बनाया। इस वंश के राजाओं ने उत्तर भारत के कन्नौज पर अधिकार के लिए ‘त्रिपक्षीय संघर्ष’ में भाग लिया।
- विशेषता: एलोरा का प्रसिद्ध कैलाश मंदिर राष्ट्रकूट राजा कृष्ण प्रथम ने बनवाया था।
2. चालुक्य वंश (वातापी)
चालुक्य वंश का सबसे प्रतापी राजा पुलेकिशन द्वितीय था। इसने उत्तर भारत के सम्राट हर्षवर्धन को नर्मदा नदी के तट पर पराजित किया था। इनकी राजधानी वातापी (बादामी) थी।
3. पल्लव वंश (कांची)
पल्लव वंश के शासकों ने कांची (काँचीपुरम) को अपनी राजधानी बनाया। नरसिंहवर्मन प्रथम इस वंश का महान शासक था। उन्होंने महाबलीपुरम के रथ मंदिरों का निर्माण कराया।
4. चोल वंश (तंजौर)
चोल वंश दक्षिण भारत का सबसे शक्तिशाली और प्रभावशाली वंश सिद्ध हुआ। इसकी स्थापना विजयालय ने की थी। बाद में राजराज प्रथम और राजेंद्र चोल ने इसे पराकाष्ठा पर पहुँचाया। उनकी राजधानी तंजौर (तंजावुर) थी।
शासन व्यवस्था
दक्षिण भारत की शासन व्यवस्था अत्यंत सुव्यवस्थित थी। राजा सर्वोपरी होता था, लेकिन वह मंत्रियों की सलाह से कार्य करता था।
- स्थानीय स्वशासन: चोल शासन की सबसे बड़ी विशेषता उनका ग्राम प्रशासन था। गाँवों का प्रबंधन ‘उर’ और ‘सभा’ नामक संस्थाएँ करती थीं, जो आधुनिक पंचायती राज की तरह कार्य करती थीं।
सामाजिक एवं धार्मिक स्थिति
समाज मुख्य रूप से वर्ण व्यवस्था पर आधारित था, लेकिन भक्ति आंदोलन ने समाज में समरसता लाने का प्रयास किया।
- नयनार और अलवार: भगवान शिव के भक्त ‘नयनार’ और विष्णु के भक्त ‘अलवार’ कहलाते थे। इन्होंने संगीत और कविताओं के माध्यम से भक्ति का प्रसार किया।
- शंकराचार्य: आठवीं शताब्दी में आदि गुरु शंकराचार्य ने ‘अद्वैतवाद’ का प्रचार किया और भारत के चारों कोनों में चार मठों की स्थापना की।
कला, साहित्य और संस्कृति
दक्षिण के राजाओं ने कला को बहुत महत्व दिया।
- स्थापत्य: पल्लवों के रथ मंदिर और चोलों का राजराजेश्वर (बृहदेश्वर) मंदिर द्रविड़ शैली के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
- साहित्य: इस काल में संस्कृत के साथ-साथ तमिल, तेलुगु और कन्नड़ साहित्य की बहुत प्रगति हुई। कंबन की ‘रामायण’ (तमिल) इसी युग की देन है।
आर्थिक स्थिति: कृषि एवं व्यापार
दक्षिण भारत की समृद्धि का मुख्य आधार उन्नत कृषि और विदेशी व्यापार था।
- सिंचाई: चोल राजाओं ने कावेरी नदी पर बाँध बनवाए और नहरों का जाल बिछाया।
- समुद्री व्यापार: चोलों के पास बहुत शक्तिशाली नौसेना (Navy) थी। वे चीन, दक्षिण-पूर्वी एशिया और अरब देशों के साथ मसालों, रेशम और कीमती पत्थरों का व्यापार करते थे।
विदेशों से संपर्क और अंकोरवाट मंदिर
भारतीय संस्कृति का विस्तार केवल भारत तक सीमित नहीं रहा। दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों जैसे कंबोडिया, जावा और सुमात्रा पर भारतीय कला का गहरा प्रभाव पड़ा।
- अंकोरवाट मंदिर: कंबोडिया में स्थित यह दुनिया का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर है, जिसे राजा सूर्यवर्मन द्वितीय ने बनवाया था। यह भगवान विष्णु को समर्पित है।
अभ्यास कार्य के उत्तर (विस्तृत विवरण)
1. राष्ट्रकूट वंश की राजधानी कहाँ थी?
राष्ट्रकूट वंश की राजधानी मान्यखेत (मलखेड़) थी, जो आधुनिक कर्नाटक राज्य के गुलबर्गा जिले में स्थित है। अमोघवर्ष प्रथम ने इस शहर को अपनी राजधानी बनाया था। राष्ट्रकूट राजाओं ने अपने समय में कला और साहित्य को बहुत बढ़ावा दिया। उनके शासनकाल में ही एलोरा और एलिफेंटा की प्रसिद्ध गुफाओं का निर्माण हुआ। यह साम्राज्य मध्य भारत से लेकर दक्षिण भारत के बड़े हिस्से तक फैला हुआ था।
2. किस चोल शासक ने श्रीलंका को जीता?
चोल सम्राट राजराज प्रथम ने सबसे पहले श्रीलंका के उत्तरी भाग पर विजय प्राप्त की थी, लेकिन उनके पुत्र राजेंद्र चोल प्रथम ने श्रीलंका के अभियान को पूरा किया और पूरे द्वीप को जीतकर चोल साम्राज्य का हिस्सा बना लिया। उन्होंने श्रीलंका के राजा महिंदा पंचम को बंदी बनाया और वहां ‘मम्मी’ मंदिर जैसे कई हिंदू मंदिरों का निर्माण भी करवाया।
3. दक्षिण भारतीय मन्दिरों की विशेषताएँ लिखिए।
दक्षिण भारतीय मंदिरों की शैली को ‘द्रविड़ शैली’ कहा जाता है। इसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- गोपुरम: मंदिरों का प्रवेश द्वार बहुत भव्य और विशाल होता है।
- विमान: मुख्य मंदिर की छत पिरामिड के आकार की होती है, जिसे विमान कहा जाता है।
- मण्डप: मंदिर में भक्तों के बैठने के लिए विशाल स्तंभों वाले हॉल होते हैं।
- जलाशय: मंदिर के परिसर के अंदर अक्सर एक पवित्र जल का तालाब होता है।
- मूर्तियाँ: बाहरी दीवारों पर देवी-देवताओं और पौराणिक कथाओं की जटिल नक्काशी की जाती है।
4. दक्षिणी भारत के राज्यों का किन-किन देशों से व्यापारिक सम्बन्ध था?
दक्षिण भारत के राज्यों (विशेषकर चोल, चेर, पांड्य और पल्लव) के व्यापारिक संबंध चीन, दक्षिण-पूर्व एशिया (इंडोनेशिया, मलेशिया, कंबोडिया), श्रीलंका, अरब और रोम से थे। वे यहाँ से मसाले, रत्न, हाथीदांत, रेशम और चंदन का निर्यात करते थे। बंगाल की खाड़ी उस समय चोलों के प्रभाव के कारण “चोल झील” कहलाती थी।
5. चोलों की शासन व्यवस्था का वर्णन कीजिए।
चोलों की शासन व्यवस्था अत्यंत सुव्यवस्थित थी, जिसकी सबसे बड़ी विशेषता स्थानीय स्वशासन (Local Self-Government) थी। साम्राज्य को मंडलों (प्रान्तों) में विभाजित किया गया था। गाँवों का प्रशासन ‘उर’ और ‘सभा’ द्वारा चलाया जाता था। राजस्व का मुख्य स्रोत भूमि कर था। उनकी नौसेना उस समय विश्व की सबसे शक्तिशाली नौसेनाओं में से एक थी।
6. दक्षिण पूर्व एशिया के देशों पर भारतीय संस्कृति के प्रभावों का वर्णन कीजिए।
भारतीय संस्कृति का प्रभाव दक्षिण-पूर्व एशिया (जैसे कंबोडिया, जावा, सुमात्रा) पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। वहां के हिंदू और बौद्ध मंदिरों की वास्तुकला, रामायण और महाभारत जैसी कथाओं का मंचन, और संस्कृत भाषा का प्रभाव आज भी जीवित है। अंकोरवाट और बोरोबुदुर के मंदिर इसके सबसे बड़े प्रमाण हैं। भारतीय धर्म और दर्शन ने वहां के सामाजिक ढांचे को गहराई से प्रभावित किया।
7. निम्नलिखित के विषय में विस्तार से लिखिए:
(क) अंकोरवाट:
अंकोरवाट मंदिर कंबोडिया में स्थित है और यह दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक स्मारक है। इसका निर्माण 12वीं शताब्दी में राजा सूर्यवर्मन द्वितीय ने करवाया था। मूल रूप से यह भगवान विष्णु को समर्पित एक हिंदू मंदिर था, जो बाद में बौद्ध मंदिर में बदल गया। इसकी दीवारों पर रामायण और महाभारत के दृश्यों की अद्भुत नक्काशी की गई है।
(ख) शंकराचार्य:
आदि शंकराचार्य एक महान दार्शनिक और धर्मगुरु थे। उन्होंने ‘अद्वैत वेदांत’ का प्रचार किया। उन्होंने भारत के चारों कोनों में चार मठों (बद्रीनाथ, पुरी, द्वारका और श्रृंगेरी) की स्थापना की ताकि हिंदू धर्म को एकता के सूत्र में पिरोया जा सके। उनका दर्शन “ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या” के सिद्धांत पर आधारित है।
(ग) रामानुजाचार्य:
रामानुजाचार्य विशिष्टाद्वैत वेदांत के प्रवर्तक थे। उन्होंने भक्ति मार्ग पर बल दिया और समाज में समानता का संदेश फैलाया। उन्होंने बताया कि ईश्वर की भक्ति ही मोक्ष का सबसे सुलभ साधन है। हाल ही में हैदराबाद में उनकी ‘स्टैच्यू ऑफ इक्वेलिटी’ का अनावरण किया गया है।
(घ) एलोरा मन्दिर:
एलोरा (महाराष्ट्र) में 34 गुफाएँ हैं, जो हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म से संबंधित हैं। यहाँ का कैलाश मंदिर अद्भुत है, जिसे राष्ट्रकूट राजा कृष्ण प्रथम ने एक ही चट्टान को ऊपर से नीचे की ओर काटकर बनवाया था। यह वास्तुकला का एक बेजोड़ नमूना है।
8. रिक्त स्थानों की पूर्ति
(क) एलोरा का कैलाश मन्दिर कृष्ण प्रथम (राष्ट्रकूट शासक) ने बनवाया।
(ख) चोल काल में गाँव को ‘उर’ या ‘कुर्रम’ कहा जाता था।
(ग) अंकोरवाट मन्दिर कंबोडिया देश में स्थित है।
(घ) पल्लव शासकों ने महाबलीपुरम के रथ मन्दिर का निर्माण कराया।
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Bahut achchi notes h, aisi hi post dalte rahie,