सावित्रीबाई फुले भारत की प्रथम महिला शिक्षिका, महान समाज सुधारिका और मराठी कवयित्री थीं। उन्होंने महिलाओं और दलितों के अधिकारों के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। उन्हें ‘भारतीय नारीवाद की जननी’ के रूप में भी जाना जाता है।
1. जीवन परिचय (प्रारंभिक जीवन)
- जन्म: 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सातारा जिले के ‘नायगांव’ में हुआ था।
- माता-पिता: उनकी माता का नाम लक्ष्मी और पिता का नाम खण्डोजी नेवसे पाटिल था।
- विवाह: मात्र 9 वर्ष की आयु में उनका विवाह 13 वर्षीय ज्योतिराव फुले (ज्योतिबा फुले) के साथ हुआ था।
2. शिक्षा का सफर
सावित्रीबाई जब शादी कर अपने ससुराल पहुंचीं, तब वे अनपढ़ थीं। लेकिन उनके पति ज्योतिराव फुले ने उनमें शिक्षा के प्रति ललक देखी।
- ज्योतिबा फुले ने उन्हें घर पर ही पढ़ाना शुरू किया।
- उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद दो शिक्षक प्रशिक्षण (Teacher Training) संस्थानों में दाखिला लिया। एक अहमदनगर में और दूसरा पुणे के ‘पुणे नॉर्मल स्कूल’ में।
- प्रशिक्षण पूरा करने के बाद, वे भारत की पहली प्रशिक्षित महिला शिक्षिका बनीं।
3. संघर्ष की गाथा
सावित्रीबाई का संघर्ष अत्यंत कठिन और प्रेरणादायक था। उस समय समाज में महिलाओं और पिछड़ों की शिक्षा को पाप माना जाता था।
- अमानवीय व्यवहार: जब वे स्कूल पढ़ाने जाती थीं, तो कट्टरपंथी लोग उन पर पत्थर, कीचड़ और गोबर फेंकते थे।
- साड़ी का विकल्प: वे हमेशा अपने बैग में एक अतिरिक्त साड़ी लेकर चलती थीं, ताकि स्कूल पहुँचकर कीचड़ वाली साड़ी बदलकर पढ़ा सकें।
- सामाजिक बहिष्कार: उनके कार्यों के कारण उनके ससुर को समाज के दबाव में आकर ज्योतिबा और सावित्रीबाई को घर से निकालना पड़ा, फिर भी उन्होंने अपना काम बंद नहीं किया।
4. उनकी साथी अध्यापिका: फातिमा शेख
सावित्रीबाई फुले के इस महान मिशन में फातिमा शेख उनकी सबसे विश्वसनीय साथी थीं।
- जब सावित्रीबाई और ज्योतिबा को उनके घर से निकाल दिया गया, तब फातिमा शेख के भाई उस्मान शेख ने उन्हें रहने के लिए घर दिया।
- फातिमा शेख ने सावित्रीबाई के साथ शिक्षक प्रशिक्षण लिया और उनके साथ मिलकर लड़कियों को पढ़ाना शुरू किया।
- फातिमा शेख को भारत की पहली मुस्लिम महिला शिक्षिका माना जाता है। दोनों ने मिलकर समाज के हर वर्ग की लड़कियों को शिक्षा से जोड़ा।
5. सावित्रीबाई फुले द्वारा किए गए प्रमुख कार्य

उन्होंने न केवल शिक्षा, बल्कि सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध भी व्यापक कार्य किए:
- प्रथम कन्या विद्यालय: 1 जनवरी 1848 को पुणे के ‘भिड़ेवाड़ा’ में उन्होंने लड़कियों के लिए भारत का पहला स्कूल खोला।
- सत्यशोधक समाज: अपने पति के साथ मिलकर उन्होंने 1873 में ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की, जिसका उद्देश्य शोषित वर्गों को न्याय दिलाना और बिना ब्राह्मणों के विवाह संपन्न कराना था।
- विधवा विवाह और भ्रूण हत्या रोक: उन्होंने विधवाओं के बाल मुंडवाने की प्रथा के खिलाफ नाइयों की हड़ताल आयोजित की। उन्होंने ‘बालहत्या प्रतिबंधक गृह’ की स्थापना की, जहाँ गर्भवती विधवाओं को आश्रय मिलता था।
- छुआछूत का विरोध: अछूत माने जाने वाले लोगों के लिए उन्होंने अपने घर का पानी का हौद (टैंक) खोल दिया, जो उस समय एक क्रांतिकारी कदम था।
- साहित्य सृजन: उनकी प्रमुख रचनाएं ‘काव्य फुले’ और ‘बावनकशी सुबोध रत्नाकर’ हैं, जिनमें उन्होंने जातिवाद और अंधविश्वास पर प्रहार किया।
6. निधन
1897 में पुणे में प्लेग की महामारी फैली। सावित्रीबाई खुद संक्रमित रोगियों की सेवा में जुट गईं। एक बीमार बच्चे को पीठ पर लादकर अस्पताल ले जाते समय वे खुद भी प्लेग की चपेट में आ गईं और 10 मार्च 1897 को उनका निधन हो गया।
सावित्रीबाई फुले का जीवन आज भी करोड़ों महिलाओं के लिए साहस और ज्ञान का प्रतीक है।
सावित्रीबाई फुले के क्रांतिकारी विचारों को उनकी कविताओं और उनके द्वारा स्थापित संस्थानों के माध्यम से और बेहतर तरीके से समझा जा सकता है।
1. ‘काव्य फुले’ का संदेश
सावित्रीबाई फुले की कविताएँ केवल साहित्य नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का घोषणापत्र थीं। उनकी कविताओं के मुख्य संदेश इस प्रकार थे:
- शिक्षा का महत्व: उन्होंने अपनी प्रसिद्ध कविता में कहा था, “जाओ, जाकर पढ़ो-लिखो, बनो आत्मनिर्भर, मेहनत करो-काम करो-ज्ञान और धन इकट्ठा करो।” उनका मानना था कि विद्या के बिना इंसान पशु के समान है।
- अज्ञानता का अंत: वे लिखती थीं कि अज्ञानता ही सभी दुखों की जड़ है। जब तक समाज शिक्षित नहीं होगा, वह अपनी गुलामी की बेड़ियों को नहीं पहचान पाएगा।
- जातिवाद पर प्रहार: उनकी कविताओं में जाति व्यवस्था को समाज के विकास में सबसे बड़ी बाधा बताया गया है।
2. उनके द्वारा स्थापित प्रमुख संस्थान
सावित्रीबाई और ज्योतिबा फुले ने केवल एक स्कूल नहीं खोला, बल्कि संस्थानों की एक पूरी श्रृंखला खड़ी कर दी:
| संस्थान/कार्य | विवरण |
|---|---|
| भिड़ेवाड़ा स्कूल (1848) | पुणे में लड़कियों के लिए खोला गया भारत का पहला आधुनिक स्कूल। |
| स्वदेशी पुस्तकालय | महिलाओं और वंचितों के लिए पढ़ने की सामग्री उपलब्ध कराने के लिए। |
| बालहत्या प्रतिबंधक गृह | उन विधवाओं को संरक्षण देने के लिए जो सामाजिक डर से आत्महत्या या भ्रूण हत्या करने पर मजबूर थीं। |
| महिला सेवा मंडल (1852) | महिलाओं के अधिकारों और मानवाधिकारों के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए। |
| सत्यशोधक समाज | सामाजिक समानता और तर्कसंगत सोच को बढ़ावा देने वाला संगठन। |
3. सावित्रीबाई फुले के बारे में कुछ रोचक तथ्य
- दत्तक पुत्र की परवरिश: उन्होंने एक विधवा ब्राह्मण महिला के बेटे ‘यशवंत’ को गोद लिया और उसे पढ़ा-लिखाकर डॉक्टर बनाया। यह उस दौर में एक अत्यंत साहसी कदम था।
- पति का अंतिम संस्कार: जब ज्योतिबा फुले का निधन हुआ, तब सावित्रीबाई ने परंपराओं को तोड़ते हुए खुद उनकी चिता को मुखाग्नि दी थी। यह महिला सशक्तिकरण का एक बड़ा उदाहरण था।
- सम्मान: 2014 में पुणे विश्वविद्यालय का नाम बदलकर ‘सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय’ कर दिया गया।
सावित्रीबाई फुले ने हमें सिखाया कि जब पूरा समाज आपके खिलाफ हो, तब भी सत्य और शिक्षा के मार्ग पर अडिग रहना चाहिए।
सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख की दोस्ती
सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख की दोस्ती भारतीय इतिहास की सबसे सुंदर और प्रेरणादायक कहानियों में से एक है। यह केवल दो महिलाओं की दोस्ती नहीं थी, बल्कि यह दो धर्मों और दो विचारधाराओं का एक ऐसा मिलन था जिसने रूढ़िवादी समाज की जड़ों को हिला दिया।
इनके साझा संघर्षों की मुख्य बातें यहाँ दी गई हैं:
1. संकट के समय का साथ
जब ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई ने दलितों और महिलाओं को पढ़ाना शुरू किया, तो उनके पिता पर समाज का भारी दबाव पड़ा। अंततः उन्हें घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। उस समय समाज के डर से किसी ने उन्हें शरण नहीं दी।
- ऐसे कठिन समय में फातिमा शेख के भाई उस्मान शेख ने अपना घर उनके लिए खोल दिया।
- फातिमा शेख ने न केवल उन्हें रहने की जगह दी, बल्कि सावित्रीबाई के कंधे से कंधा मिलाकर उनके मिशन में शामिल हो गईं।
2. पहली मुस्लिम महिला शिक्षिका
फातिमा शेख उस दौर में शिक्षित हुईं जब मुस्लिम समाज में भी महिलाओं की शिक्षा पर कड़े प्रतिबंध थे।
- उन्होंने सावित्रीबाई के साथ ही पुणे के ‘नॉर्मल स्कूल’ में शिक्षक प्रशिक्षण (Teacher Training) लिया।
- वे भारत की पहली मुस्लिम महिला शिक्षिका बनीं और सावित्रीबाई द्वारा स्थापित स्कूलों में पढ़ाना शुरू किया।
3. मिलकर किया गया संघर्ष
दोनों सहेलियों ने मिलकर उन चुनौतियों का सामना किया जो आज के दौर में अकल्पनीय लगती हैं:
- घर-घर जाकर समझाना: लोग अपनी बेटियों को स्कूल भेजने से डरते थे। सावित्रीबाई और फातिमा शेख घंटों गलियों में घूमकर माता-पिता को शिक्षा का महत्व समझाती थीं।
- सांप्रदायिक एकता का उदाहरण: एक हिंदू और एक मुस्लिम महिला का साथ मिलकर अछूतों (दलितों) और पिछड़ों के लिए काम करना कट्टरपंथियों को बहुत चुभता था। दोनों को अपने-अपने समुदायों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन उनकी दोस्ती कभी नहीं टूटी।
- एक ही स्कूल में अध्यापन: फातिमा शेख ने सावित्रीबाई के साथ पुणे के पहले कन्या विद्यालय (भिड़ेवाड़ा) में अंतिम समय तक बच्चों को पढ़ाया।
4. फातिमा शेख का योगदान
इतिहास के पन्नों में फातिमा शेख का नाम अक्सर सावित्रीबाई के साथ ही आता है, क्योंकि उनके बिना सावित्रीबाई का संघर्ष और भी कठिन हो जाता।
- फातिमा शेख ने उन मुस्लिम लड़कियों को स्कूल लाने में बड़ी भूमिका निभाई जिन्हें पर्दे की प्रथा के कारण शिक्षा से दूर रखा जाता था।
- सावित्रीबाई जब बीमार होती थीं या किसी सामाजिक कार्य से बाहर जाती थीं, तब स्कूल की पूरी जिम्मेदारी फातिमा शेख ही संभालती थीं।
निष्कर्ष
सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख की जोड़ी यह संदेश देती है कि “शिक्षा और मानवता का कोई धर्म नहीं होता।” उन्होंने साबित किया कि अगर दो महिलाएं एक-दूसरे का साथ दें, तो वे दुनिया की सबसे बड़ी कुरीतियों को बदल सकती हैं।