Important Notes on 2nd Round Table Conference for UPSC, SSC, and UP Board
🇮🇳 द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931) 🇮🇳
ऐतिहासिक घटनाक्रम और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए विशेष नोट्स
📌 सारांश (Summary) – अन्य नाम: “गांधी-इरविन समझौता कार्यान्वयन सम्मेलन”
इस सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य भारत के भावी संविधान पर चर्चा करना था, लेकिन यह ‘सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व’ (Communal Award) के मुद्दे पर आकर फंस गया। डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने दलितों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की मांग की, जिसका गांधी जी ने कड़ा विरोध किया। अंततः, कोई ठोस संवैधानिक परिणाम निकले बिना यह सम्मेलन समाप्त हो गया और गांधी जी को खाली हाथ भारत लौटना पड़ा।
⏳ ऐतिहासिक घटनाओं का विस्तृत वर्णन
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन के दौरान कई महत्वपूर्ण मोड़ आए जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की दिशा बदल दी:
- 🚢 गांधी जी की यात्रा: गांधी जी के साथ सरोजिनी नायडू, मदन मोहन मालवीय और महादेव देसाई भी लंदन गए थे। गांधी जी वहां किंग्सले हॉल में ठहरे थे।
- 👑 ब्रिटिश राजनीति में बदलाव: सम्मेलन के समय ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार कमजोर हो चुकी थी और ‘नेशनल गवर्नमेंट’ सत्ता में थी, जिसका झुकाव भारतीयों के प्रति सख्त था।
- ⚖️ सांप्रदायिक गतिरोध: सम्मेलन में अल्पसंख्यक समुदायों (मुस्लिम, सिख, ईसाई और दलित) के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग पर भारी विवाद हुआ। गांधी जी का मानना था कि दलित हिंदू समाज का अटूट हिस्सा हैं।
🔍 सम्मेलन के प्रमुख कारण
इस सम्मेलन के आयोजन के पीछे निम्नलिखित कारण थे:
- साइमन कमीशन की रिपोर्ट: 1930 की रिपोर्ट पर चर्चा करने और भारतीयों की सहमति प्राप्त करने के लिए।
- सविनय अवज्ञा आंदोलन को रोकना: प्रथम गोलमेज सम्मेलन के बहिष्कार के बाद ब्रिटिश सरकार समझ गई थी कि कांग्रेस के बिना कोई भी समझौता अधूरा है।
- डोमिनियन स्टेटस की मांग: भारत को स्वशासन देने की शर्तों पर विचार विमर्श करना।
📖 महत्वपूर्ण तथ्य (प्रतियोगी परीक्षाओं हेतु)
✅ अध्यक्ष: रैमसे मैकडोनाल्ड (ब्रिटिश प्रधानमंत्री)
✅ कांग्रेस प्रतिनिधि: केवल महात्मा गांधी
✅ महिलाओं का प्रतिनिधित्व: सरोजिनी नायडू और बेगम जहांआरा शाहनवाज
घटनाक्रम का विस्तार: जब गांधी जी लंदन पहुंचे, तो चर्चिल जैसे रूढ़िवादी नेताओं ने उन्हें “अधनंगा फकीर” कहकर संबोधित किया। सम्मेलन की चर्चा फेडरल स्ट्रक्चर कमेटी और माइनॉरिटीज कमेटी के इर्द-गिर्द घूमती रही। गांधी जी ने जोर दिया कि कांग्रेस ही पूरे भारत का प्रतिनिधित्व करती है, जबकि अन्य रियासतें और सांप्रदायिक दल केवल अपने निजी हितों की बात कर रहे थे।
📝 निष्कर्ष (Conclusion)
निष्कर्षतः, द्वितीय गोलमेज सम्मेलन संवैधानिक दृष्टिकोण से विफल रहा। इसका मुख्य कारण ब्रिटिश सरकार की “फूट डालो और राज करो” की नीति थी। हालांकि, इस सम्मेलन ने वैश्विक स्तर पर यह सिद्ध कर दिया कि भारतीय स्वतंत्रता की मांग को अब और अधिक समय तक टाला नहीं जा सकता। भारत लौटने के बाद गांधी जी ने पुनः सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया, जिससे ब्रिटिश शासन की जड़ें हिल गईं।
Description: द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (1931) में गांधी-अंबेडकर संवाद का विस्तृत इतिहास। पृथक निर्वाचन मंडल, पूना पैक्ट और दलित अधिकारों पर वैचारिक संघर्ष का विश्लेषण। प्रतियोगी परीक्षाओं (UPSC, SSC) के लिए महत्वपूर्ण नोट्स। जानें कैसे इस संवाद ने भारतीय संविधान की नींव रखी और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों को परिभाषित किया।
🇮🇳 द्वितीय गोलमेज सम्मेलन: गांधी-अंबेडकर संवाद का ऐतिहासिक विश्लेषण 🇮🇳
📌 प्रस्तावना: एक वैचारिक महासंग्राम
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन (7 सितंबर 1931 – 1 दिसंबर 1931) केवल भारत के भावी संविधान की रूपरेखा तैयार करने का मंच नहीं था, बल्कि यह भारतीय इतिहास के दो सबसे प्रखर नेतृत्वों के बीच ‘राष्ट्र’ और ‘समाज’ की परिभाषाओं के टकराव का साक्षी भी था। एक ओर महात्मा गांधी थे, जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में ‘अखंड भारत’ और ‘सांप्रदायिक एकता’ का दावा कर रहे थे। दूसरी ओर, डॉ. भीमराव अंबेडकर थे, जो दलितों (जिन्हें उस समय ‘दबे-कुचले वर्ग’ कहा जाता था) के राजनीतिक अधिकारों और उनके स्वतंत्र अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे थे।
इन दोनों के बीच का संवाद केवल राजनीतिक असहमति नहीं थी, बल्कि दो अलग-अलग जीवन-दर्शनों का आमना-सामना था। जहाँ गांधी जी का मानना था कि सामाजिक कुरीतियों को ‘हृदय परिवर्तन’ से सुधारा जा सकता है, वहीं अंबेडकर का मत था कि बिना ‘कानूनी शक्ति’ और ‘राजनीतिक सत्ता’ के दलितों का उद्धार असंभव है।
🏛️ संवाद का मुख्य बिंदु: पृथक निर्वाचन मंडल (Separate Electorates)
सम्मेलन की ‘अल्पसंख्यक समिति’ (Minorities Committee) में डॉ. अंबेडकर ने दलितों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की मांग रखी। इसका अर्थ था कि दलितों के लिए सीटें आरक्षित होंगी और उन पर केवल दलित मतदाता ही वोट डाल सकेंगे।
डॉ. अंबेडकर का पक्ष: “राजनीतिक शक्ति ही मुक्ति का मार्ग है”
अंबेडकर ने तर्क दिया कि हिंदू समाज के भीतर दलितों की स्थिति ‘दास’ से भी बदतर है। उन्होंने कहा:
“गांधी जी, हमें दया नहीं, अधिकार चाहिए। हिंदू बहुसंख्यक समाज कभी भी स्वेच्छा से दलितों को बराबरी का स्थान नहीं देगा। इसलिए, हमें अपनी रक्षा स्वयं करने के लिए राजनीतिक रूप से स्वतंत्र होना होगा।”
उनका मानना था कि ‘संयुक्त निर्वाचन’ (Joint Electorates) में दलित उम्मीदवार केवल सवर्ण हिंदुओं की कठपुतली बनकर रह जाएगा, क्योंकि उसे जीतने के लिए सवर्णों के वोटों पर निर्भर रहना होगा।
महात्मा गांधी का पक्ष: “विभाजनकारी साजिश का विरोध”
गांधी जी ने इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया। उनके तर्क अत्यंत कड़े और भावनात्मक थे। उन्होंने कहा:
“मैं मुसलमानों और सिखों के लिए विशेष प्रतिनिधित्व को सहन कर सकता हूँ, क्योंकि वे खुद को हिंदू समाज से अलग मानते हैं। लेकिन यदि अछूतों को पृथक निर्वाचन मंडल दिया गया, तो यह उन्हें हमेशा के लिए शेष समाज से अलग कर देगा। यह हिंदू धर्म को खंडित करने की ब्रिटिश साजिश है। मैं इसके खिलाफ अपने प्राणों की बाजी लगा दूँगा।”
💬 सेंट जेम्स पैलेस की ऐतिहासिक बहस (विस्तृत विवरण)
सम्मेलन के दौरान एक समय ऐसा आया जब गांधी जी और अंबेडकर के बीच का संवाद काफी तीखा हो गया। इतिहासकारों के अनुसार, जब गांधी जी ने अंबेडकर से उनकी देशभक्ति पर प्रश्नचिह्न लगाया, तो अंबेडकर का उत्तर भारतीय राजनीति के इतिहास में अमर हो गया।
डॉ. अंबेडकर का जवाब:
“गांधी जी, आप कहते हैं कि मैं उग्र हूँ, लेकिन मैं आपको बताना चाहता हूँ कि मेरा कोई देश नहीं है। जिस देश में मुझे पानी पीने के अधिकार के लिए लड़ना पड़े, जहाँ मेरी परछाईं को भी अपवित्र माना जाए, उस देश को मैं अपना देश कैसे मान लूँ? फिर भी, मैं इस देश के लिए वह कर रहा हूँ जो शायद कई अन्य देशभक्त न कर सकें।”
इस संवाद ने गांधी जी को झकझोर दिया। उन्हें पहली बार यह अहसास हुआ कि अंबेडकर की पीड़ा केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की सामूहिक चीख है।
🔍 सम्मेलन की विफलता और ब्रिटिश चालबाजी
ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैमसे मैकडोनाल्ड ने इस वैचारिक मतभेद का भरपूर लाभ उठाया। जब भारतीय प्रतिनिधि किसी एक निर्णय पर नहीं पहुँच सके, तो अंग्रेजों ने अपनी “फूट डालो और राज करो” की नीति को आगे बढ़ाते हुए अपना फैसला सुनाने का अधिकार अपने पास रख लिया।
- अल्पसंख्यक समझौता (Minorities Pact): अंबेडकर ने चतुराई दिखाते हुए अन्य अल्पसंख्यकों (मुस्लिम, ईसाई, एंग्लो-इंडियन) के साथ एक गुप्त समझौता किया ताकि उनकी मांग को सामूहिक समर्थन मिल सके।
- गांधी जी की निराशा: गांधी जी ने महसूस किया कि उन्हें अकेला कर दिया गया है। उन्होंने घोषणा की कि वे दलितों के पृथक निर्वाचन के विरुद्ध अपनी अंतिम सांस तक लड़ेंगे।
📉 परिणाम: सांप्रदायिक पंचाट और पूना पैक्ट का मार्ग
सम्मेलन बिना किसी संवैधानिक प्रगति के समाप्त हो गया। दिसंबर 1931 में गांधी जी खाली हाथ भारत लौटे, लेकिन संघर्ष अभी शुरू हुआ था।
- अगस्त 1932: ब्रिटिश सरकार ने ‘कम्युनल अवार्ड’ (Communal Award) की घोषणा की, जिसमें दलितों को पृथक निर्वाचन मंडल दे दिया गया।
- गांधी जी का अनशन: गांधी जी ने यरवदा जेल में ‘आमरण अनशन’ शुरू कर दिया। उनका कहना था कि यह निर्णय हिंदू धर्म को मार देगा।
- पूना पैक्ट (Poona Pact): पूरे देश में तनाव फैल गया। अंततः, डॉ. अंबेडकर पर भारी दबाव बना और उन्होंने गांधी जी के जीवन की रक्षा के लिए समझौता किया। 24 सितंबर 1932 को ‘पूना पैक्ट’ हुआ, जिसमें पृथक निर्वाचन को त्याग दिया गया, लेकिन दलितों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ा दी गई।
📚 प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए विशेष विश्लेषण (Masterkey Notes)
| बिंदु | महात्मा गांधी (हरिजन सेवा) | डॉ. बी.आर. अंबेडकर (सामाजिक न्याय) |
|---|---|---|
| दृष्टिकोण | आध्यात्मिक और नैतिक (हृदय परिवर्तन) | कानूनी और संवैधानिक (अधिकार) |
| जाति व्यवस्था | वर्ण व्यवस्था का समर्थन (छुआछूत का विरोध) | जाति प्रथा का समूल विनाश (Annihilation of Caste) |
| विधि | सत्याग्रह और उपवास | कानून, शिक्षा और राजनीतिक संगठन |
| लक्ष्य | एकीकृत हिंदू समाज | शोषितों का राजनीतिक सशक्तिकरण |
📝 निष्कर्ष: दो धाराओं का संगम
निष्कर्षतः, द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में गांधी-अंबेडकर संवाद भारतीय लोकतंत्र के लिए एक “आवश्यक मंथन” था। जहाँ गांधी जी ने यह सुनिश्चित किया कि दलित समाज मुख्यधारा से अलग न हो, वहीं डॉ. अंबेडकर ने यह सुनिश्चित किया कि दलितों को केवल दया का पात्र न समझा जाए, बल्कि उन्हें शासन-प्रशासन में उचित हिस्सेदारी मिले।
आज भारत के संविधान में जो आरक्षण (Reservation) और समानता का अधिकार हम देखते हैं, वह इसी संवाद की परिणति है। यह संवाद हमें सिखाता है कि महान लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए वैचारिक मतभेद होने के बावजूद संवाद का रास्ता कभी बंद नहीं होना चाहिए।
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