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Simon Commission 1927 – History

साइमन कमीशन (1927) के मुख्य बिंदु

1. गठन और उद्देश्य

ब्रिटिश सरकार ने 1927 में सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में इस आयोग का गठन किया। इसका मुख्य उद्देश्य 1919 के सुधारों (Montagu-Chelmsford Reforms) की जांच करना और भारत के लिए नए संवैधानिक सुधारों का सुझाव देना था।

2. ‘श्वेत कमीशन’ (All-White Commission)

इस कमीशन में कुल 7 सदस्य थे, और सबसे विवादित बात यह थी कि सभी सदस्य अंग्रेज थे। इसमें एक भी भारतीय सदस्य नहीं था, जिसे भारतीयों ने अपना अपमान माना।

3. भारतीयों का विरोध

कांग्रेस और मुस्लिम लीग सहित लगभग सभी भारतीय दलों ने इसका बहिष्कार किया। जहाँ भी कमीशन गया, वहाँ “Simon Go Back” (साइमन वापस जाओ) के नारे और काले झंडे दिखाए गए।

4. लाला लाजपत राय का बलिदान

लाहौर में विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज किया, जिसमें लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हो गए और बाद में उनकी मृत्यु हो गई।

5. परिणाम (Impact)

भले ही भारतीयों ने इसका कड़ा विरोध किया, लेकिन कमीशन ने 1930 में अपनी रिपोर्ट पेश की। इसी रिपोर्ट के आधार पर आगे चलकर ‘गोलमेज सम्मेलन’ हुए और भारत शासन अधिनियम 1935 का आधार तैयार हुआ।

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साइमन कमीशन, जिसे आधिकारिक तौर पर ‘इंडियन स्टैट्यूटरी कमीशन’ कहा जाता था, 1928 में भारत आया और इसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक निर्णायक मोड़ पैदा किया। इस कमीशन का गठन ब्रिटिश सरकार द्वारा 1919 के ‘भारत सरकार अधिनियम’ के कामकाज की समीक्षा करने और भविष्य के संवैधानिक सुधारों का सुझाव देने के लिए किया गया था। भारतीय नेताओं द्वारा इसके तीव्र विरोध का सबसे प्रमुख और मौलिक कारण यह था कि इस सात सदस्यीय आयोग में एक भी भारतीय सदस्य शामिल नहीं था। इसे भारतीय आत्मसम्मान पर एक गहरी चोट और नस्लवाद का प्रतीक माना गया, क्योंकि ब्रिटिश सरकार ने यह संदेश दिया कि भारतीय अपने भाग्य का फैसला खुद करने के योग्य नहीं हैं। कांग्रेस, हिंदू महासभा और मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व वाली मुस्लिम लीग ने एकजुट होकर “साइमन गो बैक” (साइमन वापस जाओ) के नारे लगाए। इस विरोध प्रदर्शन के दौरान ही लाहौर में लाला लाजपत राय पर क्रूर लाठीचार्ज हुआ, जिससे उनकी मृत्यु हो गई और देश भर में क्रांतिकारी लहर दौड़ गई।

​दूसरी ओर, सभी भारतीय नेता इस कमीशन के विरोध में नहीं थे। कुछ नेताओं और संगठनों का मानना था कि आयोग के साथ सहयोग करने से वे अपने विशिष्ट समुदायों के लिए बेहतर अधिकार प्राप्त कर सकते हैं। डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने ‘डिप्रैस्ड क्लासेस फेडरेशन’ की ओर से आयोग के समक्ष गवाही दी और दलितों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल और विशेष सुरक्षा की मांग की। इसी तरह, मद्रास की जस्टिस पार्टी ने ब्राह्मण विरोधी राजनीति और पिछड़ों के हितों के लिए आयोग का समर्थन किया। पंजाब में सर छोटू राम की यूनियनिस्ट पार्टी और मुस्लिम लीग का शफी गुट (सर मोहम्मद शफी के नेतृत्व में) भी सहयोग के पक्ष में था। विरोध का मुख्य कारण यही विरोधाभास था कि क्या भारतीयों को अपनी नियति तय करने का हक है या नहीं। जहाँ मुख्यधारा के राष्ट्रवादी इसे राष्ट्रीय अपमान मान रहे थे, वहीं हाशिए के समुदायों के नेता इसे अपनी राजनीतिक हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के अवसर के रूप में देख रहे थे। अंततः, इस कमीशन की रिपोर्ट ने ही आगे चलकर 1935 के भारत सरकार अधिनियम की नींव रखी, जिसने भारतीय संवैधानिक ढांचे को काफी हद तक प्रभावित किया।

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